अध्याय 3. शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत - Page 66

शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत

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ही बराबरी प्राप्त नहीं हुई बल्कि कुलीनता की ओर जाने का अवसर भी मिल गया। रोमन समाज में जन्म और भाग्य, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और पद की प्राप्ति में प्रमुख भूमिका का निर्वाह करते हैं। इसके अतिरिक्त मजिस्ट्रेट पद से भी समाज में प्रतिष्ठा बनती है। प्रत्येक नागरिक जन्म से चाहे वह जन सामान्य हो या कुलीन, किसी भी प्रकार से मजिस्ट्रेट की कुर्सी पर आसीन हो जाता था या उससे भी ऊंचे पद पर पहुंच सकता था तो वह व्यक्तिगत प्रतिष्ठा तथा सम्मान का अधिकारी बन जाता था। उत्तराधिकारियों के लिए भी यह सम्मानित स्थान बन सकता था और इस प्रकार यह एक उच्च कुलीन समुदाय कहा जाता था, उनसे श्रेणी विभाजन पैदा कर देता था। इस प्रकार जब जन सामान्य ख्1, पर से निषेध उठा लिए गए तो वे भी उच्च कुलीन श्रेणी में उच्चतर स्थान पर उनके आगे पहुंच गए।

रोमन विधान में अधिकार और अनधिकार के मामले में सांप्रदायिक आधार पर अंतर था किंतु तथ्य यह है कि जन सामान्य पर लागू अनाधिकार स्थायी नहीं थे। इन निषेधों का अस्तित्व था, किन्तु कुछ समय के पश्चात उन्हें हटा दिया गया। ब्राह्मणवादी विधान के समर्थक यह देखकर मुंह न खोलें कि उनके विधान की ही भांति रोमन विधान में भी समान रूप से ऊंच नीच का भाव था। उन्हें उत्तर देना होगा कि जिस प्रकार रोमन विधान ने हीन और कुलीन के मध्य ऊंच-नीच के अंतर को समाप्त कर दिया। उसी प्रकार इन ब्राह्मणवादी विधान के संचालकों ने तीन वर्गों और शूद्रों के मध्य व्याप्त ऊंच नीच के अंतर को समाप्त क्यों नहीं किया? इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि रोमन विधान के अधिकार और प्रतिबंध सांप्रदायिक नहीं थे जब कि ब्राह्मणवादी विधान में वे जातिवादी हैं।

रोमन विधान और ब्राह्मणवादी विधान में केवल यही अंतर नहीं है वरन् इसके अतिरिक्त दो भेद और भी हैं। एक है, आपराधिक मामलों में दंड विधान की समानता - रोमन विधान में नागरिक और राजनैतिक अधिकारों में समानता नहीं थी, किन्तु आपराधिक मामलों संबंधी दंड विधान में नागरिकों के बीच भेद नहीं था। यहां तक कि प्लेबियन या पेट्रीशियन के मध्य भी समान अपराध के समान दंड था चाहे कोई भी अभियुक्त हो या वादी कोई भी हो, अपराध सिद्ध हो जाने पर समान दंड दिया जाता था। लेकिन धर्म सूत्र और स्मृतियां क्या कहती हैं? वे बिल्कुल विपरीत सिद्धांत प्रतिपादित करती हैं। एक ही प्रकार के अपराध में दंड विधान वादी और प्रतिवादी की जाति के अनुसार भिन्न है। यदि अभियोग लगाने वाला शूद्र है और अभियुक्त तीन उच्च वर्ग वालों में से है तो क्रमानुसार दंड कम होता है। इसके विपरीत अभियोग लगाने वाला तीन उच्च वर्णों में से कोई एक है तो क्रमानुसार दंड प्रावधान बहुत कठोर है। यह दूसरे प्रकार की बर्बरता है जो रोमन विधान और ब्राह्मणवादी विधान में भिन्नता प्रकट करती है।

  1. जब एक साधारण व्यक्ति पौर मजिस्ट्रेट के पद पर आसीन हुआ और कुलीन परिवार का संस्थापक बना

तो रोमन उसे नया मनुष्य कहने लगे।