अध्याय 3. शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत - Page 67

52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

ब्राह्मणवादी विधान से रोमन विधान की भिन्नता का एक और उल्लेखनीय तथ्य है। इसका संबंध निषेध की प्रकृति से है। दो तथ्य विचारणीय हैं। प्रथम तो यह कि रोमन समाज में जब भी कोई परिस्थिति अस्तित्व में आई तो प्रतिबंध लगाए गए, निषेध व्यवस्था लागू की गई। जैसे ही परिस्थिति बदली वह व्यवस्था समाप्त कर दी गई और स्थिति में समानता लाई गई। दूसरी उल्लेखनीय बात रोमन विधान में यह थीं कि उसमें किसी की एक ही परिस्थिति अनन्त काल के लिए जारी रखने का प्रयास किया गया। इसमें निरंतर परिवर्तन होते रहे। दूसरी ओर रोमन विधान ने उन परिस्थितियों को भी परिवर्तित करने का प्रयास किया जिनके कारण निश्चित प्रतिबंध लागू रहा प्लेबियनों, दासों, विदेशियों और पैगानों (मूर्तिपूजकों) के उदाहरणों में यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है।

यदि उपरोक्त रोमन विधान के अंतर्गत प्रतिबंधों के संबंध में दिए गए दोनों तथ्यों पर विचार किया जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि धर्म सूत्रों और स्मृतियों ने कितनी धूर्तता की है। यदि प्रतिबंध परिस्थिति के ऊपर निर्भर रहे होते और शूद्रों को उनसे मुक्त होने के लिए प्रयास करने की आजादी होती तो शूद्रों के ऊपर निषेधाज्ञाओं को लागू किया जाना उतना बर्बरतापूर्ण सिद्ध नहीं होता। ब्राह्मणवादी विधान के अनुसार प्रतिबंधों को लागू ही नहीं किया गया। बल्कि क्रूर विधान बनाकर उन्हें अनंत बना दिया गया और उनसे मुक्ति का प्रयास करना भी दंडनीय अपराध बना दिया गया। जिसके अनुसार कड़े के कड़े दंड देने का प्रावधान कर दिया गया।

इस प्रकार ब्राह्मणवादी विधान प्रतिबंधों को केवल लागू ही नहीं करता, वरन् उनको स्थायित्व भी प्रदान करता है। एक उदाहरण है।

शूद्र वैदिक यज्ञ नहीं करा सकता, क्योंकि वह वैदक मंत्रों के उच्चारण का पात्र नहीं है। इस निषेध का कोई उल्लंघन नहीं कर सकता। धर्म-सूत्र यहीं नहीं रूकते, वे आगे बढ़कर आदेश देते हैं कि शूद्र का वेद पढ़ना या सुनना अपराध है। यदि वह ऐसा करता है तो उसकी जबान काट दी जाए और पिघला हुआ सीसा उसके कानों में उडेल दिया जाए। किस व्यक्ति को धार्मिक अनुष्ठानों से वंचित रखने के लिए क्या इससे भी बढ़ कर कोई पाशविक उदाहरण है?

इन प्रतिबंधों के संबंध में स्पष्टीकरण क्या है? शूद्रों के प्रति ब्राह्मणवादी विधान के निर्माताओं ने इतना कठोर व्यवहार क्यों किया? उनकी स्मृतियां केवल अनाधिकारों का वर्णन करती है। इनमें लिखा है कि शूद्र उपनयन का अधिकारी नहीं है। यह संपत्ति रखने का अधिकारी नहीं है किन्तु यह नहीं बताती कि क्यों? समस्त बातें तर्कहीन है। शूद्रों का निषेध उनके व्यक्तिगत चरित्र के कारण नहीं है। यह किसी प्रकार की घृणा का परिणाम भी नहीं है। शूद्र को दंडित इसलिए किया जाए क्योंकि वह शूद्र है। यह एक गुत्थी है जिसका सुलझना आवश्यक है। ब्राह्मणवादी गं्रथ समस्या का निराकरण नहीं करते। अतः इसके स्पष्टीकरण के लिए हमें और खोज करनी होगी।