अध्याय 4
शूद्र बनाम आर्य
I
पूर्व विवरण से यह स्पष्ट है कि ब्राह्मण स्मृतिकारों की कृतियों से यह पता नहीं चलता कि शूद्र कौन थे वे आर्यों का चौथा वर्ण कैसे बने। इसलिए पाश्चात्य विद्वानों द्वारा शूद्रों की उत्पत्ति के संबंध में व्यक्त मत का अवलोकन आवश्यक है। शूद्रों की उत्पत्ति के बारे में पाश्चात्य विद्वानों का निश्चत मत है। यद्यपि सभी विद्धान एकमत नहीं हैं, तथापि निम्नलिखित बातों पर सभी एकमत हैंःµ
वैदिक साहित्य की रचना आर्यों द्वारा की गई।
आर्य भारतवर्ष में बाहर से आए और भारत पर आक्रमण किया।
भारत के मूल निवासी दास और दस्यु थे, जो आर्य जाति से भिन्न जाति के थे।
आर्य गौर वर्ण के थे और दास तथा दस्यु श्याम वर्ण के।
आर्यों ने दास और दस्युओं पर विजय पाई।
दास और दस्युओं के पराजित किए जाने और दास बना लिए जाने पर ही वे
शूद्र कहलाए।
- शारीरिक रंग के पक्षपाती आर्यों ने चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को जन्म देकर गोरे रंग
और काले रंग वाली जातियों को सदा-सदा के लिए अलग कर दिया।
भारतीय आर्यों के समुदाय में शूद्रों की उत्पत्ति के संबंध में पाश्चात्य विद्वानों का मत कितना युक्तिसंगत है यह बात अलग है। किन्तु यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि ब्राह्मणवादी सिद्धांतों की आम स्थिति को दैवी आदेश से आरोपित जटिल और रहस्यपूर्ण व्याख्याओं के अध्ययन के उपरांत एक ऐसे सिद्धांत की आवश्यकता होगी जो इस विषय में तर्कसंगत और स्वाभाविक व्याख्या प्रस्तुत कर सके। ब्राह्मणी सिद्धांत क्षुद्र दृष्टि, तर्कहीन तथा निरर्थक होने के सिवाय और कुछ नहीं है। अन्यथा वे समस्याओं को ज्यों का त्यों न छोड़ देते। कम से कम पाश्चात्य विद्वानों के मत ऐसे नहीं हैं।
किसी भी सिद्धांत की सत्यता की परख उसके तर्क संगत साक्ष्यों या प्रमाणों से स्थापित होती है।