शूद्र बनाम आर्य
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किसी बहुभाषा भाषी की तरह पापी है जो दीर्घ शिरस्थ शब्दावली का प्रयोग करता है अथवा लघु शिरस्थ का सिद्धांत प्रस्तुत करता है। यह भाषा के बेबीलोनीभ्रमजाल से भी बुरा है, वह चोरी है, हमने भाषा के वर्गीकरण के लिए शब्दावली विकसित की है भले ही वे कपाल, बालों और आंखों के बारे में अपनी शब्दावली तैयार करें।
इस संदर्भ में जिन्हें यह पता है कि मैक्समूलर कभी आर्य प्रजाति के सिद्धांत को मानते थे और उन्होंने उसका प्रचार भी किया था, वे उनके विचारों की प्रशंसा करेंगे। इस प्रकार हमारे सामने दो मत हैं जिनमें कोई समानता नहीं है। (1) एकमत के अनुसार आर्य जाति का अस्तित्व उनकी शरीर रचना, उनके कपाल व मुखाकृति के आधार पर निर्धारित करता था।
(2) प्रोफेसर मैक्समूलर के अनुसार एक भाषा भाषी जन समुदाय के रूप में आर्य जाति का अस्तित्व था।
मतों के विरोधाभास की दृष्टि से यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि वैदिक साहित्य में क्या साक्ष्य उपलब्ध है। वैदिक साहित्य के विवेचन से पता चलता है कि ऋग्वेद में ‘आर्य’ और ‘अर्य’ दोनों शब्दों का प्रयोग किया गया है, एक दीर्घ ‘‘आ’’ के साथ है दूसरा हृस्व ‘‘अ’’ के साथ।
‘‘अर्य’’ शब्द का प्रयोग ऋग्वेद ख्1, में 88 बार हुआ है इसका उपयोग चार विविध अर्थों ख्2, ः- (1) शत्रु (2) संभ्रांत नागरिक, (3) भारत देश का नाम और (4) स्वामी, वैश्य अथव नागरिक के अर्थ में किया गया है।
‘‘आर्य’’ शब्द 31 बार ख्3, आया है। किन्तु उसका उपयोग कहीं भी जाति के अर्थ में नहीं किया गया है।
उपरोक्त चर्चा से यह सिद्ध होता है कि वेदों में ‘‘अर्य’’ और ‘‘आर्य’’ का शब्द उल्लेख जाति के अर्थ में कहीं भी नहीं किया गया। अतः ‘‘आर्य’’ या ‘‘अर्य’’ का अर्थ किसी जाति विशेष का नाम या संबोधन नहीं है।
अब यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि मानव शरीर रचना शास्त्र का साक्ष्य क्या है? आर्य जाति की पहचान के लिए केवल लंबे सिर का होना ही पर्याप्त नहीं। प्रो. रिप्ले ने लंबे सिर वाली दो जातियों का उल्लेख किया है। अतः हमारा यह प्रश्न अभी बरकरार है।
II
अब हम अगला आधार लेते हैं। आर्य बाहर से आए। उन्होंने भारत का आक्रमण किया और यहां के मूल निवासियों पर विजय प्राप्त की। बेहतर होगा कि इन प्रश्नों को हम अलग-अलग ही लें।
ऋग्वेद में संदर्भ सूची के लिए परिशिष्ट एक देखें।
परिशिष्ट दो देखें।
परिशिष्ट तीन देखें।