अध्याय 4. शूद्र बनाम आर्य - Page 73

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

आर्य जाति भारत में कहां से आई? आर्य जाति के मूल स्थान का पता लगाने के बारे में बहुत भ्रामक विचार हैं। बेनफे के अनुसार आर्यों के मूल स्थान का निर्धारण समान शब्दावली के आधार पर किया जाना चाहिए। प्रो. आइसक टेलर ख्1, ने उनके इन विचारों का सार संक्षेप में इन शब्दों में किया हैःµ

‘‘समस्त आर्यों की भाषा में समान शब्दावली इस बात का संकेत दे सकती है कि उस मूल भाषा के शाखाओं में बंट जाने के पूर्व उनका आरंभिक प्रदेश कौन सा था। उन्होंने कहा है कि कुछ पशुओं और वृक्षों के नाम जैसे बीच और भुर्ज वृक्ष तथा पशु भालू और भेडि़या ऐसे शब्द हैं जिनसे आदिम आर्य भली भांति परिचित थे और ये सभी कटिबंधीय जलवायु में मिलते हैं और विशेषतः यूरोप में जबकि दक्षिण एशिया के पशु और वृक्ष हैं बाध और ताड़ जिनसे केवल भारतीय और ईरानी परिचित थे। उनका कहना है कि आदिम आर्यों की भाषा में बाघ और सिंह जैसे इन एशियाई जंगली जानवर अथवा एशिया का प्रमुख भारवाही पशु ऊंट समान नामों के आर्य शब्दावली में न होने से इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि आर्य कैस्पियन सागर के पूर्वी क्षेत्र से आए क्योंकि यूनानी सिंह को सामी नाम से जानते हैं और भारतीय नाम का मूल आर्य मूल से मेल नहीं खाता। इससे यह तर्क उभरता है कि सिंह यूनानियों और भारतीयों के लिए समान नहीं है।’’

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बेनफे का कथन सार्थक सिद्ध हुआ है। गीजर ने उनका समर्थन किया, परंतु

उन्होंने आर्यों का मूल स्थान बेनफे से भिन्न कृष्ण सागर के उत्तर पश्चिम, मध्य

पश्चिम जर्मनी में बताया। गीजर का तर्क महत्वहीन नहीं था। उनका निष्कर्ष मौटे

तौर पर वृक्षों के नामों पर आधारित है जो आदिम आर्यों की भाषा में मौजूद है।

‘‘रूई’’ और ‘‘बेंत’’, ‘‘अंगु’’ और भिदूर पहाड़ी बादाम के अतिरिक्त उनकी दृष्टि

में भुर्ज, बीच और शाहबलूत शब्दों का उपयोग निर्णायक है। क्योंकि यूनान का

फीगो शाहबलूत का समकक्ष है, वह जर्मन बीच से मिलता है और लेटिन का फेग

यह संकेत देता है कि यूनानी बीच के देश से शाहबलूत के देश में आए और एक

फलदार वृक्ष का नाम दूसरे वृक्ष को दे दिया गया।’’

दूसरा मत यह है कि आर्यों का मूल स्थान काकेशिया था क्योंकि आर्यों की तरफ काकेशियाइयों का रंग साफ और भूरे बाल होते हैं। उनकी नाक ऊंची होती है और चेहरा खूबसूरत होता है। इस संबंध में रिप्ले का कथन उल्लेखनीय है। इस विषय में प्रो. रिप्ले ख्2, कहते हैंः-

  1. आईसक टेलर -ओरीजिन आफ आर्यन्स पृष्ठ 24-26

  2. रिप्ले, रेसेस आफ यूरोपियन्स पृष्ठ 436-437