अध्याय 4. शूद्र बनाम आर्य - Page 74

शूद्र बनाम आर्य

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‘‘काकेशिया के मिथ्य नाम का अनर्गल प्रलाप जो पश्चिम यूरोप की नीला

आंखों और भूरे बालों (वाली ‘आर्य’) प्रजाति’’ के लिए किया गया है। उससे

दो निर्विवाद तथ्यों का पता चलता है। पहला तो यह कि इस प्रकार की शारीरिक

बनावट काकेशिया में सैंकड़ों मील तक नहीं मिलती और दूसरे यह कि कहीं भी

काकेशियाई श्रृंखला किसी एक कबीले से संबद्ध नहीं है जो पूरी तरह आर्यों की

भाषा की तरह विभक्ति प्रधान हो।

यहां तक कि ओसेटस भी, जिनकी भाषा ही एकमात्र विभक्ति प्रधान भाषा

है, शायद यह दावा नहीं करते कि वे आर्य हैं और यदि ओसेटियन आर्य हैं भी तो

इसके कई कारण हो सकते हैं। ईरान से आए आव्रजक है और मूल काकेशियाई

बिल्कुल नहीं हैं। उनके सिर की आकृति उनके अधिकार में आए क्षेत्रों के लोगों

के समान हैं - टेरील दर्रा - दक्षिण श्रृंखला के लोगों के समान होने की अटकल

है। सभी बातों को देखते हुए कि ओसेटस आर्य हों या न हों उनका अन्य लोगों

से अधिक साम्य नहीं बैठता। इनमें इतना शरीर सौष्ठव नहीं है जितना इस क्षेत्र के

लोगों का है। इनका व्यवसाय देखते हुए ना ही ये इतने साहसी हैं और उनमें रूसियों

के समान प्रतिरोध के चिह्न भी नहीं हैं।

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यह सच नहीं है कि काकेशियन कुछ सीमा तक ‘विशिष्ट हैं।’ दरअसल इनमें

कोई विशिष्टता नहीं है यूरेशियाई भाषा भाषी इस नाम से जाने जाते हैं जैसा कि हमने

कहा है गोरांग, सुनहरी बालों वाले, लंबी कद काठी वाले लोगों को आर्य कहा जाता है।

यह सब भ्रामक है बल्कि अविश्वसनीय है। काकेशिया संस्कृति, भाषा या रीति-रिवाजों

और शारीरिक विशिष्टताओं का पालना नहीं कब्रिस्तान है। हमें यह जान लेना चाहिए

कि संसार में आरंभ से ही अन्यत्र इतनी विविधताएं नहीं है। जितनी यहां हैं, चाहे वह

भाषा का प्रश्न हो या धर्म का। कोकेशिया पर्वत माला में यह मिश्रण मौजूद है।’’

तिलक ने कहा है कि आर्य प्रजाति का मूल स्थान आर्कटिक क्षेत्र है। उनके सिद्धांत का उन्हीं के शब्दों में सार दिया जा रहा है। वे खगोल विज्ञान ओर जलवायु तत्वों से आरंभ करते हैं। उनके अनुसार यह क्षेत्र उत्तरी ध्रुव है। उनका कहना है ख्1, ःµ

‘‘दो लक्षण अथवा भिन्नताएं हैं - एक उसके लिए जब कोई अध्येता उत्तरी

ध्रुव से अध्ययन करता है और दूसरा उसके लिए जो परिध्रुवीय क्षेत्र से देखता है

या उत्तरी ध्रुव और आर्कटिक वृत्त से देखता है।’’

तिलक की दृष्टि में दो भिन्नताएं आती हैं, ध्रवीय और परिध्रुवीय। वे इसका सार इस प्रकार देते हैं।

  1. तिलक बी. जी. द आर्कटिक होम इन द वेदाज पृष्ठ 58-60