शूद्र बनाम आर्य
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दृष्टिगत होता है। सामान्य दिन और रात का प्रभात काल शीतोष्ण कटिबंध की तरह
होता है जो केवल कुछ ही घंटों का होता है। अनवरत द्यौस में सूर्य अंतरिक्ष के
ऊपर होता है वह परिक्रमा करता हुआ दिखाई देता है जिसका अवसान नहीं होता।
यह वक्र परिक्रमा करता है क्षितिजीय नहीं और दीर्घ रात्रि में वह पूरी तरह क्षितिज
के नीचे आ जाता है, जबकि शेष वर्ष उसका उदय और अस्त होता है। वह 24
घंटों के कुछ काल में सूर्य के आच्छादन के अनुसार घटता बढ़ता-रहता है।’’
अपने विश्लेषण का उपसंहार तिलक इस प्रकार करते हैंःµ
‘‘हमारे सामने धु्रव और परिध्रुव के क्षेत्र के बारे में दो भिन्नताएं अथवा लक्षण
हैं। ये ‘अवस्थाएं’ विश्व के अन्य क्षेत्रों में नहीं पाई जातीं। धरती के ध्रुव की आज
भी वह स्थिति है जो करोड़ों वर्ष पूर्व थी। इसलिए उपरोक्त खगोलीय अवस्थाएं सदा
समान रहती हैं और इससे आदि सृष्टि काल में तीव्र परिवर्तन हुए हैं।’’
तिलक ने आर्कटिक क्षेत्र की दशाओं के संदर्भ में बताया है और यह तर्क दिया हैः-
‘‘वैदिक व्याख्याओं अथवा परंपराओं से पता चलता है कि उपरोक्त प्रवृत्तियों से
यह अनुमान होता है कि ध्रुव और परिध्रुवीय परंपराओं से वे ऋषि अवगत थे जो
उन्हें वंशानुगत मिली थी। संयोग से वैदिक साहित्य में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जिनसे
दीर्घ रातों और दीर्घ दिवसों का प्रत्यक्ष संबंध मिलता है। इसके साथ ही बहुत सी
कथाएं भी इस बात के साथ मेल खाती हैं।’’
तिलक अपनी नैसर्गिक और वैदिक कथाओं से संतुष्ट है कि वे उत्तरी ध्रुव की अवस्था से मेल खाती हैं और निष्कर्ष निकालते हैं कि वैदिक आर्यों का मूल स्थान आर्कटिक क्षेत्र रहा होगा।
दरअसल यह एक मौलिक सिद्धांत है। इसमें मात्र एक बिंदु ऐसा है जिसकी अनदेखी कर दी गई है। वह है आर्यों का प्रिय प्राणी। वह उनके जीवन और धर्म से बड़ी गहनता से जुड़ा है। वह है अश्व जिसका अश्वमेघ यज्ञ ख्1, से प्रमाण मिलता है। प्रश्न है कि क्या आर्कटिक क्षेत्र में घोड़ा विद्यमान था? यदि उत्तर नकारात्मक है तो आर्कटिक क्षेत्र का सिद्धांत संदिग्ध है।
III
ऐसा कौन सा साक्ष्य है जिससे पता चले कि आर्यों ने भारत को आक्रांत किया और यहां के मूल निवासियों को अपने अधीन कर लिया? जहां तक ऋग्वेद का संबंध है उसमें रचमात्र भी भारत पर बाहर से आक्रमण का संकेत नहीं है। श्री पी. टी. श्रीनिवास आयंगर ख्2, कहते हैं।
यजुर्वेद पर माधवाचार्य का भाषण देखें।
लाईफ आफ एंसीएंट इंडिया इन द एज ऑफ मंत्राज पृ. 11-12