अध्याय 4. शूद्र बनाम आर्य - Page 77

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

‘‘मंत्रों की सावधानीपूर्वक की गई मीमांसा से, जहां आर्य, दास और दस्युओं

का संदर्भ मिलता है, पता चलता है कि वह पूजा-पद्धति का संघर्ष है, प्रजाति

का नहीं। ये शब्द अधिकांशतः ऋग्वेद संहिता में आते हैं।’’ 1,53,972 शब्दों में से

इनकी आवृत्ति 33 बार हुई है। इतना अल्प प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि आर्य

कबीला आक्रांता नहीं था, जिसने विजय के पश्चात स्थानीय लोगों को भगा दिया

हो, क्योंकि विजेता जाति अपनी विजयों का बार-बार जिक्र करती है।’’

जहां तक वैदिक साहित्य का प्रश्न है उससे पता नहीं चलता कि आर्य बाहर से आए। इस संदर्भ में ऋग्वेद के मंत्र 75 में सात नदियों का प्रसंग महत्वपूर्ण है। प्रोफेसर डी. एम. त्रिवेदी ख्1, के अनुसार ‘‘नदियों का संबोधन’’ मेरी गंगा, मेरी जमुना और मेरी सरस्वती कह कर किया गया है। कोई भी विदेशी ऐसा संबोधन क्यों करेगा? ऐसा संबोधन वही कर सकता है, जिसका इनसे निकट का भावात्मक संबंध हो।

जय पराजय के प्रश्न का उत्तर वेदों में सुलभ है। दास ओर दस्यु आर्यों के शत्रु के रूप में वर्णित हैं। इसके वध और उन्मूलन के लिए अनेक बार वैदिक ऋषियों ने देवों का आह्वान किया है। किन्तु आर्यों की विजय के विषय में कोई निर्णय करने से पहले निम्नलिखित बातों पर विचार करना आवश्यक हैः-

पहले ऋग्वेद में आर्यों और दास तथा दस्युओं में युद्ध के प्रसंगों की कोई विशेष कथा नहीं मिलती। केवल छोटी-छोटी झड़पों का उल्लेख मिलता है। यह जय पराजय का प्रमाप नहीं हो सकता। ऋग्वेद में 33 स्थानों पर इस शब्द का उल्लेख है। केवल आठ में उन्हें दासों का विरोधी कहा गया है। सात स्थानों पर दस्युओं के विरुद्ध हैं। किन्हीं-कहीं दोनों के बीच संघर्ष का उल्लेख है। जय-पराजय का प्रमाण नहीं मिलता।

दूसरे दासों, दस्युओं और आर्यों में भले ही संघर्ष की स्थिति रही हो_ दोनों में शांति बनाए रखने के लिए सम्मानजनक समझौते हुए हैं। ऋग्वेद के मंत्र 6-33-3_ 7-83-1_ 8-51-9_ 10-102-3 में स्पष्टतः कहा गया है कि आर्य और दास एवं दस्युओं ने संयुक्त रूप से शत्रु से युद्ध किया।

तीसरे, आर्य और दास एवं दस्युओं में जो भी विरोध रहा है, उनमें जातिगत विरोध नहीं रहा। ऋग्वेद के अनुसार संघर्ष जातीय नहीं, धार्मिक आधार पर था। त्रैवेद में इसका प्रमाण है। ऋग्वेद में दस्युओं ख्2, के बारे में बताया गया हैः वे I -51.8.9_ I -132.4_ 4-41.2_ 6-14.3 के अपव्रत (ऋग्वेद 5-42.2) अन्य व्रत के विभिन्न मंत्र, ऋग्वेद 8-59-11_ और 10-22.8 में अनग्नित्र (ऋग्वेद 5-189.3) अयजु अयजवान ऋग्वेद

  1. ओरिजिनल होम आफ आर्यन्स, डी. एस. त्रिवेदी, एनल्स आफ भंडारकर ओरिएंट रिसर्च इंस्टीट्यूट खंड

20, पृ. 62

  1. आयंगन-दि ओरिजिनल होम ऑफ दि आर्यन्स, डी एस. त्रिवेदी। अनल्स ऑ दि भंडारकर ओरिएंटल

रिसर्च पृ. 131