शूद्र बनाम आर्य
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1-131-44, I -33.4 और 8-59.11 में अब्रम्भ, ब्राह्मण पुरोहित विहीन 5-15.9 और 10-105.8 अनऋचा ऋग्वेद 10-105.8 ब्राह्मण द्वेषी, ऋग्वेद 5-42.9 तथा अनिन्द्र ऋग्वेद 1 -133_ 5-2.3_ 7-18.6_ 10.27.6 और 10-48.7 बताया गया है।
ऋग्वेद के मंत्र 10-22.8 में कहा गया है - ‘‘हम दस्यु जातियों के बीच रहते हैं। ये न तो यज्ञ करती हैं और न किसी की पूजा। उनके संस्कार अनुष्ठान भी भिन्न है। अतः वे मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है। हे शत्रु हंता! इन दासों का विनाश करो।’’
इस विवेचन से ऋग्वेद के अनुसार इस मत का खंडन होता है कि आर्य बाहर से आए और उन्होंने यहां के मूल निवासियों दास-दस्युओं को जीता।
IV
यह तो हुई आर्यों के बाहर से आने, दास दस्युओं को जीतने की बात। अब तक इस पर आर्य दृष्टिकोण से विचार किया गया है। आइए अब इस पर विचार करें कि क्या दास और दस्युओं के नाम का प्रयोग जातिसूचक है। जो इसका समर्थन करते हैं वे इस का प्रमाण देते हैंःµ
जो लोग दासों और दस्युओं से जातीय संघर्ष मानते हैं, वे निम्नांकित प्रश्नों का उत्तर देंःµ
ऋग्वेद में प्रयुक्त मृध्रावक और अनास को दस्युओं के लक्ष्य गुण के समान बताया गया है।
ऋग्वेद में दास कृष्ण वर्ण कहे गए हैं।
ऋग्वेद में मृध्रावक शब्द का 1-1, 4.2_ 5-32.8_ 7-6.3 तथा 7-18.3 में प्रयोग किया गया है।
ऋग्वेद में मृध्रावक से आशय है वह व्यक्ति जो गंवार है और अपरिष्कृत भाषा का प्रयोग करता है। क्या भाषा का गंवारू पन या अपरिष्कृत होना जाति भिन्नता का साक्ष्य माना जा सकता है? इसे साक्ष्य के रूप में ग्रहण करना विवेकशीलता नहीं है।
ऋग्वेद 5-29.10 में अनास का अर्थ क्या है? इसकी दो व्याख्याएं मिलती हैं। प्रो. मेक्समूलर के अनुसार अनास का अर्थ बिना नाकवाला या चपटी नाक वाला है। सायणाचार्य इसका अर्थ बिना मुंह वाला, अर्थात कटुभाषी बताता है_ अर्थात देव वचनों से वंचित। सायणाचार्य ने इस शब्द को अन असा पढ़ा है, मैक्समूलर के अन्नासा अर्थात बिना नासिका वाला। इनमें शुद्ध क्या है? उनका मत विसंगत प्रतीत होता है। इसके पक्ष में दो बातें प्रमुख है - एक तो यह कि शब्द के अर्थ का अनर्थ नहीं किया गया और दूसरा यह कि दस्युओं को कहीं भी बिना मुंह अथवा बिना नाक वाला नहीं बताया गया। उन्हें मृध्रावक का पर्याय माना जाना चाहिए। अस्तु ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो इस मत की पुष्टि करे कि दस्यु एक भिन्न जाति थी।