अध्याय 4. शूद्र बनाम आर्य - Page 79

64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

अब दासों को लें। यह सच है कि ऋग्वेद 6-47.21 में दासों का कृष्णांग बताया गया है। फिर भी इस मत को स्वीकार करने से पूर्व निम्नांकित बातों पर विचार करना आवश्यक हैःµ

  1. ऋग्वेद में दासों के लिए केवल एक बार कृष्ण योनि शूद्र का प्रयोग किया गया है।

  2. यह स्पष्ट नहीं है कि क्या यह शब्द लाक्षणिक रूप से प्रयोग किया गया है अथवा शब्दिक अर्थ में।

  3. हमें यह पता नहीं है कि क्या यह यथार्थ है अथवा घृणा का प्रतीक।

जब तक इन प्रश्नों का समुचित उत्तर न मिले, यह मत स्वीकार करना संभव नहीं कि दासों को कृष्ण योनि का कहा जाने मात्र से उन्हें काले रंग की जाति का माना जाए।

देखिए ऋग्वेद के निम्नांकित मंत्रःµ

  1. ऋग्वेद 6.22.10ः हे वज्रि तुमने दासों को आर्य बनाया है, अपनी शक्ति से बुरे को अच्छा बनाया है। हमें भी यहीं शक्ति दो जिससे हम शत्रुओं पर विजय पा सकें।

  2. ऋग्वेद 10.49.3ः इंद्र कहते हैं - मैंने दस्युओं को आर्य संबोधन से वंचित कर दिया है।

  3. ऋग्वेद 1-15.108ः हे इंद्र यह मालूम करो कि आर्य कौन हैं और दस्यु कौन। इनको पृथक करो।

इन मंत्रों से क्या पता चलता है? उनसे यह स्थापित होता है कि आर्यों और दासों तथा दस्युओं के बीच अंतर न तो प्रजातीय था और न ही शारीरिक बनावट का। इसी लिए दास और दस्यु आर्य कहे जा सकते हैं। अतः इंद्र से कहा गया कि उन्हें आर्यों से अलग किया जाए।

V

पश्चिमी लेखकों द्वारा आर्य जाति के विषय में प्रतिपादि सिद्धांत का आधार निर्मूल है। यह आश्चर्य की बात है क्योंकि पश्चिमी विद्वानों के निष्कर्ष आम तौर पर गहन गवेषणा और विश्लेषण पर आधारित होते हैं। इस सिद्धांत पर वे क्यों विफल रहें? यह जानना महत्वपूर्ण है कि वे क्यों असफल रहे। ध्यान से निरूपण करने पर पता चलता है कि वे दुहरी भ्रांतियों से ग्रसित हैं। पहली बात तो यह है कि वे खुशफहमियों और उन पर आधारित अटकलों से ग्रस्त रहे। दूसरी बात यह है कि यह सिद्धांत वैज्ञानिक अनुसंधानों के प्रतिकूल हो गए। इस कारण तथ्य प्रकट न हो सके। इसके विपरीत उन्होंने इसे सिद्ध करने के लिए पूर्वनिर्णित और चुनिंदा सिद्धांत अपनाएं।