शूद्र बनाम आर्य
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आर्य जाति का सिद्धांत अनुमान के सिवाय कुछ नहीं है। यह डा. बोप के दार्शनिक विचारों पर आधारित है जो उन्होंने सन् 1835 में प्रकाशित अपनी युगांतकारी पुस्तक कम्पेरेटिव ग्रामर में प्रकट किए हैं। इस पुस्तक में डा. बोप ने लिखा है कि यूरोप की अधिकांश और एशिया की कुछ भाषाओं से पता चलता है कि उनके पूर्वज एक ही थे। जिन भाषाओं की और डा. बोन ने संकेत किया है वे भारत-जर्मन भाषाएं कहलाती हैं। इन्हें समुच्च रूप से आर्य भाषा कहा गया है क्योंकि वैदिक भाषा आर्यों का उल्लेख करती है और वह भारत - जर्मन भाषा परिवार से संबद्ध है। यही मुख्य सिद्धांत आर्य जाति पर लागू है।
इसके दो अनुमान हैं (1) जातियों की एकता और (2) यह प्रजाति आर्य जाति है। तर्क यह है कि यदि भाषाओं का उदगम समान अनुवांशिक बोलियां हैं तो ऐसी जाति विद्यमान रही होगी जिसकी वह मातृभाषा रही हो और वह आर्य जाति की आर्य बोली रही होगी। इस तरह पृथक आर्य जाति का अस्तित्व मात्र अनुमान है। इस अनुमान से एक और अनुमान का उदय होता है जिससे समान मूल स्थान का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ। एक तर्क दिया जाता है कि ऐसा कोई भाषा समूह नहीं हो सकता जब तक कि उस भाषा समूह के लोगों का समाना आवास और संसर्ग न रहा हो। इस तरह समान आवास के सिद्धांत का अनुमान एक अन्य अनुमान पर आधारित है।
आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत एक नया अनुसंधान है। इसकी खोज की आवश्यकता पश्चिमी विद्वानों के इस कथन को सिद्ध करने के लिए पड़ी कि ‘इंडो जर्मन’ ही वर्तमान मूल आर्यों के मूल प्रतिनिधि हैं। इनका मूल स्थान यूरोप बताया गया है। यहां प्रश्न उठता है कि आर्य भाषा भारत में कैसी पहुंची और इसका उत्तर यही होगा कि आर्य बाहर से आए। इस तरह आक्रमण का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ।
तीसरी कल्पना एक और भी है कि आर्य एक श्रेष्ठ जाति थी। इस मत का आधार यह विश्वास है कि आर्य यूरोपीय जाति के थे और यूरोपीय होने के नाते वे एशियाई जातियों से श्रेष्ठ हैं। श्रेष्ठता की इस परिकल्पना को यथार्थ सिद्ध करने के लिए भी इस कहानी के गढ़ने की आवश्यकता पड़ी कि यह सोचकर आक्रमण की बात कहने के सिवाय और तरीका नहीं है। इसलिए पश्चिमी लेखकों ने यह कहानी रची कि आर्यों ने आक्रमण करके दासों और दस्युओं को पराजित किया।
चौथा तर्क यह है कि गौर वर्ण ख्1, होने के कारण यूरोपीय जातियां एशियाई जातियों से घृणा करती हैं क्योंकि वे श्याम वर्ण होती हैं, आर्यों को यूरोपीय मान लेने से उनके रंगभेद की नीति में विश्वास आवश्यक हो जाता है और उसका साक्ष्य वे चातुर्वर्णीय व्यवस्था से खोजते हैं। पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार वर्ण व्यवस्था रंगभेद का पर्याप्त है।
- दास और दस्युओं के संबंध में अध्याय 6 देखें।