66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
इन परिकल्पनाओं में कोई भी तथ्यों पर आधारित नहीं है। आर्य जाति के मूल को ही लें। इस सिद्धांत में यह बात ध्यान में नहीं रखी गई है कि शारीरिक बनावट एक बात है और तथ्य अलग हैं। यह संभव है कि यदि कोई जाति शारीरिक बनावट में भिन्न है तो भी उसका कोई मूल स्थान रहा होगा। वह भाषायी दृष्टि से किसी अन्य स्थान की भी हो सकती है। आर्य जाति के मूल का सिद्धांत समान भाषा पर आधारित है और यह मान लिया गया है कि उसकी बनावट भी समान होगी। यह दावा कि आर्य बाहर से आए और भारत पर आक्रमण किया और वह कल्पना कि दास या दस्यु भारत के मूल निवासी थे ख्1, एकदम गलत है।
फिर यह कहना कि चातुर्वर्ण्य व्यवस्था आर्यों की रंगभेद की नीति पर आधारित है यथार्थ से बहुत दूर है। यदि जातीय भेद भाव का आधार रंग ही है तो चारों वर्णों के चार ही रंग होने चाहिए थे जो चातुर्वर्ण्य में शामिल हों। किसी ने नहीं बताया कि वे चार रंग कौन से हैं और वे चार जातियों कौन सी हैं। यह सिद्धांत आर्य और दासों की कल्पना पर आधारित है। पहले को श्वेत और दूसरे को कृष्ण मान लिया गया।
आर्य जाति के अभ्युदय के सिद्धांत के प्रतिपादक अपने मत की पुष्टि में इतने उत्कंठित हैं कि वह यह भी भूल बैठे हैं कि उनकी परिकल्पना में कितनी विसंगतियां हैं। ये केवल उत्पत्ति को सिद्ध करना चाहते हैं और इसलिए उन्होंने वेदों से जो कुछ उन्हें अनुकूल लगा सिद्ध साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया।
प्रोफेसर माइकल फोस्टर ने कहीं कहा है कि अटकलें विज्ञान की सहायक हैं। बिना अटकलों के अनुसंधान सफल नहीं हो सकते। साथ ही यह भी सत्य है कि अब अटकलों का ही वर्चस्व हो जाता है तो यह विज्ञान के लिए घातक होता है। पश्चिमी विद्वानों का आर्य जाति का सिद्धांत एक दृष्टांत है कि किस प्रकार अटकलों ने विज्ञान को विषाक्त बना दिया है।
आर्य जाति की उत्पत्ति का सिद्धांत एक पुरानी भ्रांति है। इसका अंत बहुत पहले हो जाना चाहिए था। किन्तु इसके विपरीत इसका जनसाधारण पर प्रभाव दृढ़ हुआ है। इसके दो कारण रहे हैंःµ
पहला ब्राह्मण विद्वानों के सिद्धांत का समर्थन। यह बहुत आश्चर्यजनक हैं। हिंदू होने के नाते उन्हें पाश्चात्य विद्वानों के इस मत को अमान्य करना था कि यूरोपीय जाति होने के कारण वे एशियाई जातियों से श्रेष्ठ बताई गई हैं। किंतु ब्राह्मण इसका तिरस्कार करने के बजाय इसका समर्थन करते हैं। इसका एक सरल सा कारण है कि ब्राह्मण दो राष्ट्र के सिद्धांत में विश्वास रखता है। वह स्वयं को आर्यों का प्रतिनिधि मानता है और शेष
- रंगभेद के अंतर पर प्रो. रिप्ले का मत देखें इफा पृ. 76