शूद्र बनाम आर्य
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हिंदुओं को अनार्य जातियों की संतान कहने से इस सिद्धांत से उसके उत्तम होने के अहम की पूर्ति होती है। वह आर्यों के बाहर से आने तथा अनार्य जातियों को विजित करने के सिद्धांत का समर्थन इसलिए करता है कि इससे उसे अब्राह्मणों पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने का औचित्य ठहराने में सहायता मिलती है।
दूसरे पाश्चात्य विद्वानों का ‘‘वर्ण’’ का अर्थ ‘‘रंग’’ अधिकार ब्राह्मण विद्वानों ने स्वीकार कर लिया है। वास्तव में आर्य सिद्धांत का मूल आधार यही है। जब तक वर्ण की यह व्याख्या माना जाती रहेगी आर्य सिद्धांत जीवित रहेगा। अतः आर्य सिद्धांत के यह अंश महत्वपूर्ण हैं और उनका स़ूक्ष्म विश्लेषण जरूरी है। यह तीन प्रकार के हो सकते हैंःµ
(अ) क्या यूरोपीय जातियां गोरी थीं या काली,
(ब) क्या भारतीय आर्य गोरे थे?
(स) वर्ण-शूद्र का वास्तविक अर्थ क्या है?
प्राचीनतम यूरोपियनों के रंग के बारे में प्रोफेसर रिप्ले ख्1, निश्चित रूप से कहते हैं
कि वे काले थे। अब तक के अनुसंधान और विविध तथ्यों के निरूपण से यूरोपीय
केवल लम्बोतरे सिर वाले ही नहीं थे बल्कि वे काले रंग के भी थे। हमने दक्षिणी
फ्रांस में प्रागैतिहासिक जाति क्रो मगनोन का अस्तित्व सिद्ध किया है, जिनके बाल
काले और आंखें आकर्ष्क हैं और हमने पाया है कि इन कृषकों में काले बाल और
आंखें बड़ी-बड़ी हैं और ब्रिटिश आइल्स और स्काटलैंड के ताम्रवर्णी लोगों से समानता
की है जो ब्रिटेन की प्रागैतिहासिक जातियां हैं। इतना ही नहीं, ‘गरफागनाओं’ से भी
समानता है। जहां उत्तरी इटली की प्राचीन ‘लिगूरियन’ जाति के वंशज मिलते हैं ये
मानव सामान्यतः काले हैं। अतः सामान्य सिद्धांतों और स्थानीय विवरण के संदर्भ
में से यह स्पष्ट है कि यूरोप की पूर्ववर्ती जातियां निश्चय ही अश्वेत थीं ओर ये
मेडिटेरियन थी न कि स्केंडीनेवियाई।
अब वेदों पर आते हैं। संभव है कोई ऐसा उदाहरण मिल जाए जो आर्यों की रंगभेद की नीति का संकेत दें।
ऋग्वेद (1.117.8) में प्रसंग है कि आश्विन ने श्याथा और रूसति से विवाह किया। श्याथा काली थी और रूसति गोरी।
ऋग्वेद (1-117.5) में आश्विन की स्तुति कुंदनवर्णा वंदना के उद्धार के लिए की गई।
ऋग्वेद (9-3.9) में एक आर्य ने पिशांक रक्ताभ ताम्रवर्ण वाले गुणी पुत्र के लिए देवताओं की आराधना की।
- प्रो. रिप्लेः रेसिस आफ यूरोप पृ. 466