68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
इन उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि आर्य वर्ण भेद के समर्थक नहीं थे। वे ऐसा क्यों करते? उनकी अनेक जातियां थीं। जिनका रंग भिन्न-भिन्न था, वैसे ताम्रवर्ण, श्वेतांग, श्यामल आदि। दशरथ के पुत्र राम और यदु के वंशज कृष्ण को श्याम वर्ण दिखाया जाता है। ये आर्य थे। ऋग्वेद के अनेक मंत्रों के सृष्टा ऋषि दीर्घात्तमा थे। वे श्याम वर्ण के थे। ऋग्वेद के मंत्र 10.31.11 के अनुसार महान ऋषि कण्व भी श्याम वर्ण के ही थे।
अब अंतिम पहलू वर्ण शब्द ख्1, के अर्थ को लेते हैं। सर्वप्रथम हम यह देखेंगे कि ऋग्वेद में इसका प्रयोग ख्2, किस अर्थ में किया गया है। ऋग्वेद में ‘‘वर्ण’’ शब्द 22 बार आया है। इसका प्रयोग ऊषा, अग्नि, सोम आदि आराध्यों के रूप, स्वरूप या रंग के अर्थों में सत्रह बार किया गया है। देव आराध्यों के लिए प्रयुक्त होने के कारण यह अनुमान लगाना श्रेयस्कर नहीं होगा कि वर्ण शब्द को ऋग्वेद में मानवों के लिए कब प्रयुक्त किया गया । ऋग्वेद में चार पांच बार इसका प्रयोग प्राणियों के लिए किया गया है। देखिए ये मंत्र हैंःµ
(1) 1-104.2, (2) 1-179.6, (3) 7-12.4,
(4) 3-34.5, (5) 9-76.2
इससे यह प्रकट नहीं होता कि शारीरिक रंग के लिए ऋग्वेद में वर्ण शब्द का प्रयोग किया गया है अथवा नहीं।
ऋग्वेद के मंत्र (3-34.5) से संदेह उत्पन्न होता है। इसकी व्याख्या विन्यास शुक्ल वर्ण का वृद्धि श्लेष अलंकार है। एक अर्थ तो यह है कि इंद्र ने ऊषा को अपने प्रकाश से शुक्ल रंग की वृद्धि अर्थात प्रकाश की वृद्धि के लिए आदेश दिया और दूसरा अर्थ यह होता है कि शुक्लांगों की संख्या में वृद्धि।
ऋग्वेद के मंत्र 9-71.2 की व्याख्या भी ‘‘असुर वर्ष निकंदन’’ अपने आप में स्पष्ट नहीं है। यह सूक्त सोम-पावनम से संबंधित है। यह बात ध्यान में रखनी होगी कि सोम असुर वर्ण निकंदन के रूप में वर्णित है। यहां ‘‘वर्ण’’ का अर्थ रूप है। पद का दूसरा भाग कहता है उसने आपने श्यामल या काले आवरण को उतार फेंका और आकर्षक आवरण को धारण किया।’’ यहां ‘वर्ण’ का अर्थ काला रंग होता है।
ऋग्वेद का मंत्र (1-179.6) बहुत ही सहायक है। इसके अनुसार ऋषि अगस्त्य ने प्रजा, संतति और बल प्राप्त करने के लिए लोभमुद्रा से सहवास किया और उससे दो वर्ण उत्पन्न हुए। यद्यपि इस पद से यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि वे दो वर्ण कौन थे, फिर भी यह कहा जा सकता है कि दो वर्ण से अर्थ आर्यों और दासों से है। यदि ऐसा ही मान
महाराष्ट्र ज्ञान कोष खंड तीन पृ. 39-42
देखें परिशिष्ट चार पृ. 248