अध्याय 4. शूद्र बनाम आर्य - Page 84

शूद्र बनाम आर्य

लिया जाए तो निस्संदेह ‘‘वर्ण’’ का अर्थ ‘‘वर्ण’’ होता है न कि शरीर का रंग।

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ऋग्वेद के मंत्र 1-104.2 और 2-12.4 के दासों के लिए ‘‘वर्ण’’ शब्द का प्रयोग किया गया। प्रश्न यह है कि दासों के संदर्भ में प्रयुक्त शब्द वर्ग का अर्थ क्या है? क्या इसका यह अर्थ लिया जाए कि दास श्याम रंग के थे अथवा उनका अपना अलग वर्ण था? दोनों में कोन सा ‘‘अर्थ’’ सही है यह पता नहीं चलता। अतः किसी निश्चय पर नहीं पहुंचा जा सकता।

ऋग्वेद का साक्ष्य अधूरा है। इस संबंध में भारतीय ईरानी साहित्य में वर्ण शब्द की गवेषणा सहायक सिद्ध हो सकती है। यदि हां, तो किस रूप में? ख्1,

सौभाग्यवश ‘जैंड अवेस्ता’ में यह शब्द वरण या वरेणा के रूप में उपलब्ध है। इसका शाब्दिक अर्थ धार्मिक सिद्धांत और संप्रदाय का विश्वास या आस्था है। इस शब्द की उत्पत्ति ‘‘वर’’ से हुई और ‘‘वर’’ का सामान्य अर्थ धार्मिक आस्था विश्वास और मत है। ‘‘वर’’ या ‘‘वरे’’ शब्द का प्रयोग गाथाओं में इसी अर्थ में 6 बार आया है।

इसका उल्लेख गाथा अहुनावैती - यासनाहा 30 पद 2 में हुआ है। इसका अनुवाद इस प्रकार हैःµ

‘‘एकाग्रचित होकर उस सत्य को सुनो जिसे में उदघाटित करता हूं। अपनी कुशाग्र

बुद्धि से मनन करो। प्रत्येक व्यक्ति को अपने विश्वास को दृढ़ करना चाहिए। महाकाल के

पूर्व प्रत्येक व्यक्ति को उस रूप के प्रति सजग होना चाहिए जो हमने बताया हैं’’

इस गाथा का यह अत्यंत प्रसिद्ध उपदेश है जिसमें जराथुश्ट्रा ने प्रत्येक व्यक्ति को उद्वोधित किया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बुद्धि के बल पर अपनी आस्था निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र चिंतन करना चाहिए। इसमें अवरेनाओं शब्द का अर्थ है आस्था और प्रयुक्त शब्द विचि थाह्या का अर्थ है वरण से पूर्व विवेचना।

इसका उल्लेख गाथा अहूनावेति - यासना हा 31 पद 11 में है। ‘वरेनेंग’ शब्द ‘वरण’ का बहुवचन है जिसका अर्थ है आस्था, विश्वास इस पद में जराथुश्ट्रा ने मानव सृष्टि का वर्णन किया है। उसने मानव सृष्टि के उल्लेख के बाद अंतिम पंक्ति में कहा है (मानव को) स्वैच्छिक विश्वास दिया गया है।

इसका उल्लेख गाथा उद्यटावैसि-यासना हा 45 पद एक में वरण के संबंध में है। उपदेश की अंतिम पंक्ति में जराथुष्ट्रा ने कहा है दुरास्था शैतान की जबान है।

इसका उल्लेख गाथा उद्यटावैसि - यासना हा 45 पद दो में है। उपरोक्त की भांति ‘वरण’ का अर्थ विश्वास, धर्म और आस्था आदि है। जराथुष्ट्रा ने पाप-पुण्य के विश्लेषण की दार्शनिक व्याख्या की है। उन्होंने मानव के द्धिभावों को दर्शाया है। इस पद में मन

  1. वर्ण शब्द के विषय में मैंने श्री दस्तूर बोडे से जानकारी ली जिन्हें इस संबंध में अच्छा ज्ञान है।