आर्यों के विरूद्ध कार्य
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मनु के हाथ धाने को वे प्रातः काल पानी जाए। जब वे हाथ धो रहे थे तो उनकी अंजलि में एक मछली आ गई। वह उनसे बोली ‘मेरी रक्षा करो। मैं तुम्हें बचा सकती हूं।’ मनु ने पूदा ‘तुम कैसे बचाओगी’ मछली ने उत्तर दियाः- ‘एक जल प्रलय से पूरी सृष्टि आप्लावित होगी इससे मैं तुम्हें बचाऊंगी।’’ मनु ने पूछा, ‘तुम कैस बच सकती हो?’ मछली बोली, जब तक मैं छोटी हूं मुझे घड़े में रखो। मैं बहुत त्रस्त हूं क्योंकि बड़ी मछली छोटी को खा जाती है। जब मैं घड़े में रहने योग्य न रहूं तो किसी पोखर में डाल देना, इसके पश्चात मुझे सागर में ले जाना। तब में भयमुक्त हो जाऊंगी।’’ तुरंत ही उसका आकार बढ़ गया। उसने कहा कि ‘जब जल प्लावन हो तो तुम नाव में चढ़कर आना मैं तुम्हें दूर ले जाऊंगी।’ इस प्रकार मनु ने मछली को बचा लिया और सागर में ले गए। उसी वर्ष मनु ने एक नाव बना ली। जब जल-प्लावन हुआ तो मनु नाव में सवार हो गए। मछली उनके पास आ गई। उन्होंने नाव का लंगर मछली के सींग में बांध दिया। इस तरह वे उत्तरी पर्वत की ओर आ गए। मछली ने कहा कि मैं तुम्हें यहां ले आई हूं। नाव का लंगर किसी वृक्ष से बांध दो। कहीं पानी तुम्हें बहा न ले जाए। तुम पर्वत पर चले जाना और जब पानी उतर जाए तब उससे बाहर आ जाना। इस प्रकार जब सारी सृष्टि नष्ट हो गई तो मनु ही अकेले बचे। अपनी वंश वृद्धि के लिए मनु जलांजलि देते रहे और धार्मिक अनुष्ठान करते रहे। उन्होंने पाक की आहुतियां भी दी। उन्होंने मक्खन, शुद्ध घी, छाछ और दही की भी आहुतियां दीं। तब एक वर्ष पश्चात एक नारी उत्पन्न हुई। वह स्निग्ध थी। उसके पैरों में घी चिपका था। उसे ‘मित्र’ और ‘वरूण’ मिले उन्होंने उससे पूछा तुम कौन हो? उसने उत्तर दिया, ‘मनु की पुत्री’। ‘तू हमारी है’ उन्होंने कहा। उसने कहा, ‘नहीं मैं उसी की हूं जिसने मुझे उत्पन्न किया हैं’ उन्होंने भी उसे अपनाना चाहा। उसे वचन दिया या नहीं किन्तु वह वहां से चली गई। तब मनु के पास आई। मनु ने पूछा, ‘तुम कौन हो?’ वह बोली, ‘आपने मुझे घी, दूध और दही की आहूति देकर उत्पन्न किया है। मैं आशीर्वाद का प्रसाद हूं। मुझे यज्ञ में होम कर दो। यदि तुम मुझे यज्ञ में होम करोगे तो तुम संतति और पशुओं से संपन्न होंगे।’
‘‘मेरे माध्यम से तुम जो भी वरदान चाहोगे मिलेगा। तदनुसार उन्होंने उसे होम कर दिया। इसके पश्चात वह हवनकुंड से अंतिम रूप में प्रकट हुए। उसके साथ उन्होंने पूजा और धार्मिक अनुष्ठान किए। उन्होंने उसके साथ जो भी वरदान मांगे वे उन्हें प्राप्त हुए। वह इड़ा बनी। इसके उपरांत मनु और इड़ा को संतति प्राप्त हुई। उसके साथ उन्होंने जो वरदान मांगे वे मिले।’’
शतपथ ब्राह्मण 6.1.2.11. ख्1, - ‘‘प्रजापति ने धरा पर जीवों की उत्पत्ति की। उसके लिए तीन औषधियां पकाई गई। वह उसने खाई। वह गर्भवान हुआ। उसने उर्ध्व वायु से देवताओं और अधोवायु से प्राणियों को उत्पन्न किया। प्रजापति ने जैसे चाहा रचना की। प्रजापति ने विश्व रचना की।’’
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 30