अध्याय 5. आर्यों के विरुद्ध कार्य - Page 91

76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

  1. शतपथ ब्राह्मण 7.5.2.6. ख्1, - ‘‘प्रारंभ में प्रजापति अकेले थे। उन्होंने खाद्यान्न सृष्टि का विचार किया और उसे साकार किया। अपनी श्वास से पशु, आत्मा से मानव, आंखों से अश्व, सांस से बैल, कान से भेड़ और स्वर से बकरी को पैदा किया। क्योंकि उन्होंने पशुओं की सृष्टि अपने श्वास से की, इसलिए इस मानव ने श्वास को पशु कहा। अतः, मानव पशु से श्रेष्ठ और पराक्रमी है। आत्मा ही श्वास है क्योंकि सभी श्वास आत्मा पर आधारित हैं। चूंकि उसने मनुष्य को अपनी आत्मा से रचा, इसलिए वह कहता है कि मानव भी पशु है। इसलिए सभी मनुष्य हैं।’’

  2. शतपथ ब्राह्मण 10.1.3.1. ख्2, - ‘‘प्रजापति ने जीव रचना की। अपने शरीर के उर्ध्व वासु से देवगण और अधोवायु से प्राणियों की रचना की तदुपरांत संहारक मृत्यु को जन्म दिया।’’

  3. शतपथ ब्राह्मण 10.4.2.1. ख्3, - ‘‘आरंभ में यह ब्रह्मांड पुरुष रूप में मात्र आत्मा थी। उसने ध्यान से देखा तो वह अकेला था। उसने कहा अहं (मैं) इससे उसका नाम हमें (मैं) हो गया। इसीलिए जब कोई व्यक्ति स्वयं को प्रथम पुरुष में कहता है तो ‘‘अहं’’ कहता है और उपस्थित होने पर अन्य पुरुष का नाम पुकारता है। उसने असत को भस्म कर दिया। वह पुरुष कहलाता है। अकेले में यह भयाक्रांत था क्योंकि वह जानता था कि मेरे सिवाय कुछ नहीं है। फिर उसके यह सोचने पर कि वह क्यों डरे, भय दूर हुआ। किसी दूसरे से ही कोई डरता है। पर उसे सुख नहीं मिला। उसने सहभागी की कामना की। अपने लिए साथी की कामना की और एतदर्थ उसने स्वयं को दो भागों में विभाजित किया। परिणामस्वरूप पति-पत्नी का जन्म हुआ। दोनों के सहवास से मानव पैदा हुए। पत्नी यह सोच कर कि पुरुष ने पैदा किया है अतः उसके साथ रमण कर गायब हो गई और गाय बन गई। पुरुष बैल बन गया और मैथुन कर गायों को जन्म दिया। स्त्री घोड़ी बनी, पुरुष घोड़ा बना, स्त्री गधी बनी पुरुष गधा बना। इसके मैथुन से फटे खुर वाले पशु पैदा हुए। तदुपरांत स्त्री बकरी बनी, पुरुष बकरा बना। स्त्री भेड़ बनी पुरुष दुम्बा बना। इस प्रकार चींटी से लेकर सभी प्रकार के नर-मादा पैदा हुए।’’

  4. तैत्तिरीय ब्राह्मण 2.2.9.2. ख्4, - ‘‘आरंभ मेंं यह ब्रह्मांड शून्य था। न आकाश था न पृथ्वी, न वायु। इस शून्य ब्राह्मण ने इच्छा की कि मेरा विस्तार हो। उनसे तेज उत्पन्न हुआ। उस तेज से धुआं प्रकट हुआ। फिर एक तेज उत्पन्न हुआ, उससे प्रकाश निकला। फिर तेज प्रकट हुआ। उस प्रकाश से लौ निकली? पुनः तेज जमा, उससे किरणें उत्पन्न हुई। इसके पश्चात फिर तेज प्रकट हुआ, उससे लपटें निकली। फिर तेज हुआ और उससे बादल बने। बादल बरस उठे। इससे सागर बना। तभी से मानव समुद्र का जल नहीं

  5. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 24

  6. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 31

  7. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 25

  8. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 28-29