अध्याय 5. आर्यों के विरुद्ध कार्य - Page 92

आर्यों के विरूद्ध कार्य

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पीता, क्योंकि इसे वह प्रजनन का स्थान मानते हैं। इसके उपरांत दास, होत्री उत्पन्न हुए। प्रजापति दास होत्री हैं। वह व्यक्ति सफल मनोरथ होता है जो तप की शक्ति जानता है और उसका अनुशीलन करता है। जब जल द्रवित हुआ तो प्रजापति की आंखों में आंसू आ गए कि मेरे जन्म का प्रयोजन क्या है। उनका जो अश्रु जल में पड़ा वह धरती बन गया, जिसे उन्होंने पौंछ दिया वह वायु बन गया, जिसे उन्होंने पौंछ कर फेंक दिया वह आकाश बना। जिन परिस्थितियों में उनका अश्रुपात हुआ वह अरोदित कहलाता है। उस क्षेत्र को रोद भी कहा जाता है। जो इसका भेद जानते है वे घर में कभी नहीं रोते। यह शब्दों की उत्पत्ति है जो इस संसार के जन्म में अवगत हैं उन्हें कोई सांसारिक दुख नहीं व्यापता। उन्होंने धरती को आधार बनाया। उन्होंने कामना की - ‘‘मेरा विस्तार हों।’’ उन्होंने तप किया वह गर्भवान हुए। उन्होंने अपने उदर से असुरो को जन्म दिया उन्होंने उन्हें मिट्टी के पात्र में आहार दिया। उन्होंने शरीर धारण किया इससे अंधकार फैल गया। उन्होंने फिर विस्तार की कामना की और तपस्या की। फिर गर्भ ठहरा। उन्होंने योनि से प्रजा को जन्म दिया। उन्हें उन्होंने काठ के पात्र में आहार दिया। उन्होंने यह धारणा की तो चन्द्रमाला प्रकाश हुआ। उन्होंने कामना की, मेरा विस्तार हो। उन्होंने तप किया कि गर्भ ठहरे। उन्होंने कांख से ऋतुओं को जन्म दिया। उन्होंने रजत पात्र में घी दिया। उन्होंने फिर शरीर धारण किया, इससे काल का जन्म हुआ जिससे दिन और रात बने। उन्होंने कामना की मेरा विस्तार हो, उन्होंने तप किया कि उन्हें गर्भ ठहरे। उन्होंने अपने मुख से देवताओं को जन्म दिया। उन्होंने उनको स्वर्णपात्र में सोम दिया। उन्होंने शरीर धरा। इससे दिन बना। यह प्रजापति की सृष्टि है। जो यह जानता है वह संतति उत्पन्न करता है। देवत्व हमारे सक्षम है। इस प्रकार जो देवत्व को जानता है वह उसे प्राप्त करता है। शून्य से मानव की रचना हुई। मानव से प्रजापति बने। प्रजापति की वंश वृद्धि हुई। जो विद्यमान है। मानस में रहता है। ब्रह्मा ने इसे स्वोवास्य कहा है जो व्यक्ति यह जानता है कि ऊषा और संध्या प्रकाशमान होती हैं, उसका संतिति विस्तार होता है और धन-धान्य से संपन्न हो जाता है। वह परमेष्ठि बन जाता है।’’

  1. तैत्तिरीय ब्राह्मण 2.3.8.1 ख्1, - ‘‘प्रजापति ने इच्छा की, मेरा विस्तार हों’’ उन्होंने तपस्या की। वे गर्भवान हो गए। वे पीतांभ -ताम्रवर्णा हो गए। जैसे कि एक गर्भवती स्त्री पीली और ताम्रवर्णा हो जाती है। भ्रूण धारण करने पर वे क्लांत हो गए।

क्लांति के पश्चात् उनमें कालिमा युक्त कत्थई रंग का प्रभुत्व हो गया, जैसाकि क्लात व्यक्ति हो जाता है। उनकी श्वास तीव्र को गई। श्वास (असु) से असुर उत्पन्न हुए। इस प्रकार असुरों में आसुरी प्रवृत्ति होती है जो असुरों की इस आसुरी प्रवृत्ति को जानता है वह व्यक्ति श्वास युक्त होता है श्वास उसका परित्याग नहीं करता। असुरों से सृष्टा होने के कारण वे स्वयं को पिता मानते हैं। इसके पश्चात् उन्होंने पितरों की रचना की। इसका तात्पर्य है पिताओं के पिता। जो पिताओं के पितृ मर्म जानते हैं वे स्वयं के

1 म्यूर खंड 1, पृष्ठ 23