अध्याय 5. आर्यों के विरुद्ध कार्य - Page 93

78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

पिता बन जाते हैं। पिता उनकी आहूति ग्रहण करते हैं। पिताओं की सृष्टि के बाद उनमें प्रकाश उत्पन्न हुआ। इसके पश्चात उन्होंने मानस की रचना की। यह मनुष्यों की मानवता है। जो मनुष्य की मानवता को जानते हैं वे बुद्धिमान होते हैं। मानव उनका परित्याग नहीं करता। जब वे मानवों की सृष्टि कर रहे थे तो स्वर्ग में दिन का उदय हुआ। फिर उन्होंने देवों की रचना की। यह देवों का देवत्व हैं जो देवों का देवत्व जानते हैं उनके लिए स्वर्ग में दिवस का उदय हुआ। ये चार धाराएं हैं, जैसे देव, मानव, पितृ और असुर। इन सब में जल वायु के समान है।

  1. तैत्तीरी ब्राह्मण 3.2.3.9 ख्1, शूद्र शून्य से जन्मा। तैत्तीरीय आरण्यक ने सृष्टि के आरंभ की निम्नांकित व्याख्या की हैः-

तैत्तिरीय आरण्यक 1.2.3.1. ख्2, सर्वत्र जल ही जल था, कमल पत्र पर प्रजापति अकेले थे। अपने मन में उन्होंने विचार किया, ‘मैं रचना करूं’ मनुष्य जैसे कोई इच्छा करता है वह वाणी से प्रकट करता है और कार्यरूप देता है। इस प्रकार यह मंत्र प्रस्फुटित हुआ, पहले इच्छा उत्पन्न होती है जो मानस का प्रथम तंतु है। ऋषि अपनी मेधा से उसका अनुसंधान करते हैं, मनन करते हैं। जैसा विद्यमान और अविद्यमान के बीच है। ऋग्वेद 10-129.4। जो यह जानते हैं कि मानव मानस में इच्छा उत्पन्न होती हैं उन्होंने तपस्या की और तपश्चर्या से शरीर धारण किया। उनके शरीर के मांस से अरूण, केतु और वातरसन ऋषियों का जन्म हुआ। नाखूनों से वैखानस और बालों से बालखिल्य पैदा हुए। रक्त ने जल के मध्य विचरण करते हुए कच्छप का स्वरूप ग्रहण किया। प्रजापति ने कच्छप से कहा - ‘‘तुम मेरे मांस चर्म से जन्मे हो।’’ कच्छप ने कहा - नहीं मैं तो पहले भी था। तब सहस्र मुख, नेत्र और सहस्र पैरों वाले पुरूष का जन्म हुआ। (ऋग्वेद 10.90.1)। प्रजापति ने कहा - आप मुझ से पहले पैदा हुए हैं अतः आप सृष्टि की रचना करें।

पुरुष ने जलंलि में जल लेकर पूर्व की ओर फेंका और कहा - ‘‘तुम सूर्य बन जाओ।’’ जिस दिशा से सूर्य पैदा हुआ वह पूर्व दिशा कहलाई। अरूण केतु के दक्षिण में जल फेंक कर ‘हे अग्नि’ कहा तो अग्नि उत्पन्न हुई। पश्चिम में जल फेंक कर ‘हे वायु’ कहा तो वायु का जन्म हुआ। उत्तर की ओर जलांजलि देने पर कहां ‘हे इंद्र’ तो इंद्र उत्पन्न हुए। तत्पश्चात अरूण केतु ने जल को मध्य में रखकर पूषण को जन्म दिया। जल को ऊपर रखकर उसने देव, मानव, पितृ, गंधर्व और अपसराओं की रचना की। ऊपर से गिरी जल की बूंदों से असुर, राक्षस और पिशाच पैदा हुए। चूंकि वे बूंदों से उत्पन्न हुए इसलिए वे लुप्त हो गए। अतः उन्होंने यह कहा - ‘‘जब महाजल गर्भवान हो गया, मेधा संपन्न हुआ और स्वयंभू को उत्पन्न किया। उससे सृष्टि की रचना हुई। यह सब जल से उत्पन्न हुआ, इसलिए यह सब ब्रह्मा-स्वयंभू है। इस प्रकार यह सब शिथिल था, अस्थिर था। वह प्रजापति था। उसने स्वयं से स्वयं की रचना की और आत्मसात हो गया। तब

  1. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 21

  2. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 32