अध्याय 5. आर्यों के विरुद्ध कार्य - Page 94

आर्यों के विरूद्ध कार्य

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इस मंत्र का उच्चारण किया, ‘विश्व रचना करके, विद्यमान की रचना करके, दिग-दिगंत की सृष्टि कर सर्वप्रथम प्रजापति उत्पन्न हुए और स्वयं आत्मसात हो गए।’’

VI

अतः महाभारत भी विश्व रचना का वर्णन है महाभारत के वनपर्व का मूल मनु को बताया गया है-

वैवस्वत मनु के पुत्र मनु प्रजापति के सामन तेजस्वी ऋषि थे। उन्होंने जल के मध्य एक पांव पर खड़े होकर ऊपर हाथ उठाकर निर्निमेष होकर निरंतर दस हजार वर्ष तक विस्तीर्णा बद्री में अपने पूर्वजों से भी कठोर तप किया। वसन तार तार और केश प्रभावहीन हो गए। चिरणी नदी के तट पर एक मछली उनके निकट आई और बोली, हे प्रभो! मैं निरीह भयाक्रांत मीन हूं। मछलियों से मेरी रक्षा करो क्योंकि बड़े मच्छ छोटी मछलियों को निगल जाते हैं। मेरी त्राण करें। मैं आपको इसका प्रतिफल दूंगी। दयार्द्र मनु ने मछली को जल से निकाल कर एक पात्र में रख लिया। आकार बढ़ने पर उसे पोखर में रखा हालांकि पोखर दो योजन लंबा और एक योजना चौड़ा था। वह कमल नैन मीन को छोटा पड़ा और वे उसे गंगा में ले गए। फिर मछली ने कहा, यह स्थान कम है। मनु उसे सागर के जल में छोड़ने गए। समुद्र के जल का स्पर्श होते ही मत्स्य ने मानव की भाषा में मनु से कहा - आपने मेरी हर तरह से रक्षा की। अतः मैं आपको बताना चाहती हूं कि समस्त सृष्टि पर संकट छा रहा है। निकट भविष्य में सभी चराचर जीव, पदार्थों का अस्त होने वाला है। अब विश्व की शुद्धि का समय आ गया है। मैं तुम्हें बताती हूं, क्या शुभ होगा। आप शीघ्र एक मजबूत नाव बनाकर सप्तर्षियों के साथ सभी प्रकार के जीवों के बीज लेकर सागर तट पर आकर मेरी प्रतीक्षा करें। आप मुझ को मेरे सींग से पहचान लेंगे। मैं आपका अभिवादन करूंगी। आइए और जल्दी कीजिए। इतना कह कर मत्स्य जल में विलीन हो गई। मनु, लौटे और शीघ्र ही एक मजबूत जलपोत में सत्पर्षियों और समस्त पदार्थों के बीज के साथ सागर के किनारे जा पहुंचे। मत्स्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। मनु ने शीघ्रता के साथ जलपोत की रस्सी मत्स्य के सींग के साथ बांध दी। मत्स्य तीव्र गति से गरजती उमड़ती समुद्र की लहरों पर नाव को खींचता चला। समुद्र के आलोड़न-विलोड़न में मदमस्त नारी की तरह नाव बहती गई। धरती लुप्त हो गई थी। वायु और आकाश के अतिरिक्त सर्वत्र जल ही जल था और उस जल में सप्तर्षियों सहित मनु और मत्स्य थे। अनेक वर्षों के अथक प्रयास से मत्स्य उनको हिमवत पर्वत की उच्चतम चोटी तक ले आया और स्मित मुस्कान के साथ ऋषियों से नाव को पर्वत के नौबंधन शिखर से बांधने को कहा। नाव के रूकने पर मित्र मत्स्य ने ऋषियों को संबोधित करते हुए कहा - मैं ब्रह्मा, प्रजापति, ब्रह्म हूं। तुम्हें जल से उबार लाया हूं। अब मनु सभी जीवों, पदार्थों, देवजनों, असुरों, मानवों और चर-अचर पदार्थों की रचना करेंगे। यह कह कर मत्स्य अंतर्ध्यान हो गया। मनु ने तपोबल से अंतदृष्टि