बौद्धों का अपमानµछुआछूत का मूलाधार
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चलकर) ओह! यह तो अपशकुन हो गया, एक बौद्ध श्रमण हमारी ओर चला आ रहा है। (थोड़ा विचार कर) अच्छा उसे आने दो, हम दूसरे रास्ते से चले जाते हैं।य्
आठवें प्रकरण में भिक्षु राजा के साले शकार के उद्यान में एक तालाब पर कपड़े धो रहा है। विट के साथ शकार आता है और उसे देखकर श्रमण को मारने की ध मकी देता है। उनके बीच निम्नलिखित संवाद विशेष महत्त्व का है।
फ्शकार - ठहर अरे दुष्ट श्रमण।
श्रमण - ओह! यह राजा का साला है। क्योंकि यह किसी श्रमण से रुष्ट हो गया है, इसलिए अब जो भी श्रमण मिलता है यह उसे पीटता है।
शकार - ठहर, मैं तेरे सर को ऐसे ही चूर-चूर कर डालूंगा जैसे कसी सराय में कोई मूली को।
विट - मित्र, एक श्रमण को, जिसने संसार त्याग कर काषाय पहन रखा है, पीटना अच्छा नहीं।
श्रमण - उपासक! प्रसन्न रहें।
शकार - मित्र, देख यह मुझे गाली दे रहा है।
विट - यह क्या कह रहा है।
शकार - यह मुझे उपासक कहता है। क्या मैं नाई हूं।
विट - यह तो वास्तव में तुम्हें बुद्ध का उपासक बना तुम्हारी प्रशंसा कर रहा है।
शकार - यह यहां क्यों आया है।
श्रमण - इस चीवर को धोने के लिए।
शकार - ओह! अरे दुष्ट श्रमण मैं स्वयं इस तालाब में स्नान नहीं करता। मैं तुझे एक प्रहार से मार डालूंगा।
काफी मारपीट के बाद श्रमण को जाने दिया जाता है। यहां हिन्दुओं की भीड़ के बीच एक बौद्ध श्रमण दिखाई देता है। उससे दूर-दूर रहा जाता है और बचा जाता है। उसके विरुद्ध घृणा का भाव इतना जबरदस्त है कि जिस सड़क पर वह चलता है लोग उस सड़क से भी बचते हैं। घृणा का भाव इतना प्रबल है कि बौद्ध जिस मार्ग से जाता है हिन्दू उस पर चलना ही छोड़ देते हैं। बौद्ध श्रमण का दर्जा ब्राह्मण के समान है। ब्राह्मण मृत्यु दण्ड से मुक्त है। उसे शारीरिक दण्ड भी नहीं दिया जा सकता किन्तु एक बौद्ध श्रमण मारा जाता है, बिना किसी प्रायश्चित के, बिना किसी