86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
आत्मग्लानि के, मानो इसमें कोई बुराई ही नहीं।
यदि हम स्वीकार कर लें कि ये छितरे व्यक्ति बौद्ध थे और ब्राह्मण धर्म के बौद्ध धर्म पर हावी हो जाने पर दूसरों की तरह इन्होंने आसानी से बौद्ध धर्म छोड़कर ब्राह्मण धर्म ग्रहण करना स्वीकार नहीं किया, तो हमें दोनों प्रश्नों का एक समाधान मिल जाता है। इससे यह बात साफ हो जाती है कि अछूत ब्राह्मणों को अशुभ क्यों मानते हैं, वे उन्हें पुरोहित क्यों नहीं बनाते और अपने मुहल्लों तक में क्यों नहीं आने देते? इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ये छितरे व्यक्ति क्यों अछूत समझे गए? ये छितरे व्यक्ति ब्राह्मणों से घृणा करते थे क्योंकि ब्राह्मण बौद्ध धर्म के शत्रु थे और ब्राह्मणों ने इन छितरे आदमियों को अछूत बनाया। क्योंकि ये बौद्ध धर्म को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। इस तर्क से यह निष्कर्ष निकलता है कि अस्पृश्यता के मूल कारणों में से एक कारण घृणा का भाव है जो ब्राह्मणों ने बौद्धों के प्रति पैदा किया।
क्या बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म के बीच की घृणा ही इन छितरे आदमियों के अछूत बन जाने का एकमात्र कारण हो सकता है? स्पष्ट है कि नहीं। ब्राह्मणों ने बौद्धों के विरुद्ध समान रूप से घृणा का प्रचार किया था, इन छितरे आदमियों के विरुद्ध कुछ विशेष रूप से नहीं, क्योंकि अस्पृश्यता ने केवल इन छितरे व्यक्तियों को अपने शिकंजे में कस लिया। क्या इसके अतिरिक्त कुछ और भी परिस्थितियां रही होंगी? इससे आगे हम इसी दिशा में कुछ निर्णय करने का प्रयत्न करेंगे।