84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
कि इन छितरे व्यक्तियों ने ही ब्राह्मणों को मान्यता देने से इंकार किया। ब्राह्मणों ने छितरे व्यक्तियों को फ्अपवित्रय् क्यों माना? फिर छितरे हुए आदमियों ने ब्राह्मणों को अपवित्र क्यों माना? इस परस्पर घृणा का क्या कारण है?
इस परस्पर घृणा से एक स्पष्टीकरण यह हो सका है कि ये छितरे आदमी बौद्ध थे। इसलिए वे ब्राह्मणों का आदर नहीं करते थे उन्हें पुरोहित नहीं बताते थे और उन्हें अपवित्र समझते थे। दूसरी ओर ब्राह्मण भी इन छितरे आदमियों को पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वे बौद्ध थे। उनके विरुद्ध घृणा का प्रचार करते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि छितरे आदमी अछूत समझे जाने लगे।
हमारे पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि वे छितरे आदमी बौद्ध थे। किंतु किसी प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं है, जबकि उस समय अधिकांश हिंदू बौद्ध ही थे। हम मान लेते हैं कि वे बौद्ध थे।
इसके प्रमाण हैं कि हिंदुओं के मन में बौद्धों के विरुद्ध घृणा का भाव विद्यमान था और यह घृणा का भाव ब्राह्मणों का पैदा किया हुआ था।
नीलकंठ ने अपने फ्प्रायश्चित मयूखय् ख्1, में मनु का एक श्लोक उद्धृत किया है। जिसका अर्थ इस प्रकार हैःµ
फ्यदि कोई आदमी किसी बौद्ध, पाशुपात पुष्प, लोकायत, नास्तिक अथवा किसी महापातकी का स्पर्श करेगा तो वह स्नान करने से ही शुद्ध हो सकेगा।य्
अपरार्कर ने अपनी स्मृति ख्2, में इसी मत का प्रचार किया है। वृद्ध हारीत ने एक कदम आगे जाकर बौद्ध विहार में जाने को पाप घोषित किया है, जिससे मुक्त होने के लिए आदमी को स्नान करना चाहिए।
बुद्ध के अनुयायियों के विरुद्ध इस घृणा के भाव का इतना अधिक प्रचार हो गया था कि यह संस्कृत नाटकों में देखा जा सकता है। इस दुर्भावना का सबसे अच्छा प्रमाण ‘मृच्छकटिक’ में है। नाटक के सातवें प्रकरण में नायक चारुदत्त अपने मित्र चैत्रेय के साथ नगर के बाहर उद्यान में बसन्त सेना की प्रतीक्षा कर रहा है। वह नहीं आई, अतः चारुदत्त उद्यान से चला जाना चाहता है। ज्यों ही वे विदा होते हैं, वे समवाहक नाम के बौद्ध भिक्षु को देखते हैं। उसके दिखाई देने पर चारुदत्त कहता हैःµ
फ्मित्र मैत्रेय, मैं बसन्त सेना से मिलने के लिए उत्सुक हूं आओ हम चलें। (थोड़ा
घोरपड़े द्वारा सम्पादित, पृ. 95
स्मृति समुच्चय, पृ., 118