अध्याय 10
गोमांस भक्षणµछुआछूत का मूलाधार
अब हम जनगणना आयुक्त के परिपत्र में दी गई संख्या-10 को लेते हैं, इसका प्रसंग पूर्व अध्याय में आ चुका है, जो गोमांस खाने से संबंधित है।
जनगणना के परिणामों से ज्ञात होता है कि जो जातियां आजकल फ्अछूतय् गिनी जाती हैं, उनके भोजन का मुख्य मद मरी गाय का मांस है। फ्हिंदू जातिय् चाहे कितनी ही नीच क्यों न हो, गोमांस का स्पर्श नहीं करेगी। दूसरी और कोई जाति नहीं, जो वास्तव में फ्अछूतय् है और जिसको मृत गो से कुछ लेना देना नहीं। कुछ उसका मांस खाते हैं, कुछ उसका चमड़ा उतारते हैं, कुछ उसके चमड़े तथा हड्डी की चीजें बनाते हैं।
जनगणना के आयुक्त के सर्वेक्षण से यह प्रमाणित हो जाता है कि अछूत गोमांस
खाते हैं। तो प्रश्न यह है कि क्या गोमांसाहार का अस्पृश्यता की उत्पत्ति से कोई संबंध है? अथवा अछूतों के आर्थिक जीवन में यह एक सामान्य घटना है? क्या हम कह सकते हैं कि छितरे व्यक्तियों को जो गोमांस खाते थे अछूत कहा जाने लगा? यह तथ्य है।
सर्वप्रथम हमारे पास ये तथ्य हैं कि अछूत और अछूत कहे जाने वाले अन्य समुदाय मृत गोमांस खाते हैं, अन्य नहीं। छुआछूत और मृत गोमांस के प्रयोग के बीच इतना अधिक गहन संबंध है कि छुआछूत की जड़ों का सिद्धांत अकाट्य प्रतीत होता है। दूसरे यदि अछूतों और हिंदुओं को अलग करने वाली कोई बात है तो वह है गोमांसाहार। हिंदुओं के आहार के दो सिद्धांत हैं जो विभाजक रेखा का कार्य करते हैं। एक सिद्धांत मांसाहार के विरुद्ध है जो हिंदुओं को शाकाहारियों और मांसाहारियों में विभाजित करता है। दूसरा सिद्धांत गोमांसाहार के विरुद्ध है जो हिंदुओं को उन दो वर्गों में विभाजित करता है जो गोमांस खाते हैं और जो गोमांस नहीं खाते हैं। छुआछूत के बारे में पहली विभाजक रेखा का कोई महत्त्व नहीं है। लेकिन दूसरी विभाजक रेखा का महत्त्व है, क्योंकि यह अछूतों और गैर-अछूतों को पूर्ण रूप से विभाजित