11. क्या हिन्दू गोमांस कभी नहीं खाते थे? - Page 109

94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

उन सबका आधार हैं। देवताओं ने कहा है। निश्चय ही गो और बैल प्रत्येक वस्तु का आधार है आओ हम दूसरी (पशु योनियों की) जो शक्ति है वह गो और बैल को ही दे दें। चूंकि गो और बैल सबसे अधिक खाते हैं इसलिए यदि कोई किसी गो या बैल का मांस खाता है तो वह सब कुछ खाता है, अथवा वह सबके अंत व सबके विनाश को पहुंचता है। इसलिए उसे गो तथा बैल का मांस नहीं खाना चाहिए।य् [*]

मंत्र संख्या 1, 2, 3 तथा 6 में और स्थल हैं जहां नैतिक आधार पर पशु बलि का निषेध है।

एक इसी प्रकार का कथन आपस्तम्ब धर्मसूत्र के श्लोक 1, 5, 17, 29 में भी है। जहां गो मांसाहार पर एक व्यापक प्रतिबंध लगाया गया है।

हिन्दुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया, इस संबंध में यही कथन उपलब्ध है। हम इस साक्ष्य का क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?

जहां तक ऋग्वेद के साक्ष्य का संबंध है, हम उसे ठीक तौर पर न पढ़ने से और ठीक तौर पर न समझने से ही इस परिणाम पर पहुंच सकते हैं। ऋग्वेद में गो के लिए जो अवध्य विशेषण आया है, उसका अर्थ यही है कि जो दूध देती है, इसलिए वह मारे जाने के अयोग्य है। हां, यह बात तो सत्य है कि ऋग्वेद के समय में गो के लिए आदर था। किन्तु गो के लिए ऐसी आदर और पूजा की भावना की आशा आर्यों जैसी खेतिहर जाति से ही हो सकती है। गो का यह उपयोग आर्यों को उन्हें भोजन के लिए मारने से नहीं रोकता था। वास्तव में गो पवित्र मानी जाने के कारण भी उसकी हत्या होती थी।

काणे का कहना हैःµ

फ्ऐसा नहीं था कि वैदिक काल में गो पवित्र नहीं थी। उसकी पवित्रता के कारण ही वाजसनेयी संहिता में यह व्यवस्था दी गई है कि गो मांस खाना चाहिए [*] ।य्

ऋग्वेद कालीन आर्य भोजन के लिए गोहत्या करते थे और मांस खाते थे, यह ऋग्वेद से ही एकदम स्पष्ट है। ऋग्वेद में इन्द्र का कथन है कि फ्वे एक के लिए 15-20 बैल पकाते हैं।य् ऋग्वेद (10-86-14) का ही कथन है कि अग्नि देवता के लिए घोड़ों, वृषभों, बैलों, बांझ-गौओं तथा भेड़ों की बलि दी जाती थी। ऋग्वेद (10-72.6) से यह भी स्पष्ट होता है कि गो को एक खड़ग अथवा कुल्हाड़ी से मारा जाता था।

जहां तक शतपथ ब्राह्मण का संबंध है प्रश्न यह है कि क्या वह निर्णयात्मक मानी जा सकती है? स्पष्ट ही है कि नहीं। दूसरे ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसे पाठ हैं जो इससे भिन्न मत व्यक्त करते हैं।

* धर्मशास्त्र विचार (मराठी), पृ. 180