11. क्या हिन्दू गोमांस कभी नहीं खाते थे? - Page 111

96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

मौसल (सुरा और घी) इसका उपयोग सौत्रामणी और राजसूय यज्ञ में ही होता था), परिव्राजक (सरसों का तेल और उसकी खली)। माधव गृह सूत्र (1, 9, 22) का कहना है कि वेद की आज्ञा है कि मधुपर्क बिना मांस के नहीं होना चाहिए, इसलिए यदि गो को छोड़ दिया तो एक बकरी के अथवा एक मेढ़े के मांस की या पायस की बलि देनी चाहिए (हि.गृ.सू. 1, 13, 14) के अनुसार कोई जंगली मांस (हिरन आदि) की बलि देनी चाहिए। बौधायन गृह सूत्र (1, 13, 14) के अनुसार बिना मांस के मधुपर्क हो ही नहीं सकता। यदि कोई मांस की बलि न दे सकता हो तो वह चावल पका ले।

इस प्रकार मधुपर्क में मांस, विशेष रूप से गो मांस, एक आवश्यक अंश है। अतिथि के लिए गो हत्या की बात इतनी सामान्य हो गई थी कि अतिथि का नाम ही ‘गोधना’ पड़ गया था अर्थात् गो की हत्या करने वाला। इस हत्या से बचने के लिए आश्वालयान गृह सूत्र का सुझाव है कि अतिथि के आगमन पर गो को छोड़ देना चाहिए। जिससे गो हत्या भी न हो और आतिथ्य नियम भी भंग न हो।

तीसरे आपस्तम्ब धर्म सूत्र के कथन के निराकरण के रूप में मृत देह के संस्कार का उल्लेख किया गया है। सूत्र का कहना ख्1, हैः-

  1. उसे तब निम्नलिखित यज्ञ साधन मृत शरीर पर रखने चाहिए।

  2. दाएं हाथ में गुहू नाम का चम्मच।

  3. बाएं हाथ में उपभृत नाम का दूसरा चम्मच।

  4. दायीं ओर फ्स्पयय् नाम की लकड़ी का याज्ञिक खड्ग, बायीं ओर

अग्निहोत्रहुवनी। (वह कलछी जिससे अग्निहोत्र हवन में आहुति दी जाती

है)।

  1. छाती पर ध्रुव (सुवा बड़ा) सिर पर कटोरे, उसके दांतों पर पत्थर।

  2. उसकी नाक के दोनों ओर दो स्रुवे।

  3. यदि स्रुवा एक ही हो तो उसी के दो टुकड़े कर दिए जाएं।

  4. दोनों कानों के पास दो प्रसिन्नहरण अर्थात् वे बर्तन जिनमें ब्राह्मण की

याज्ञिक भोजन सामग्री रखी जाती है।

  1. काणे, खण्ड II, भाग 1, पृ. 545