11. क्या हिन्दू गोमांस कभी नहीं खाते थे? - Page 113

98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

  1. मृत व्यक्ति की छाती पर एक पांचवीं आहुति दी जानी चाहिए। साथ में यह

मंत्र फ्निश्चय ही इससे सहस्रों का जन्म हुआ है। अब वह इसमें उत्पन्न

हो। स्वर्ग के लिए स्वाहा।य्

ऊपर के आश्वलायन गृह सूत्र के उद्धरण से यह स्पष्ट है कि प्राचीन आर्यों में जब कोई आदमी मरता था तो पशु की बलि दी जाती थी और उस पशु का अंग प्रत्यंग मृत व्यक्ति के उन्हीं अंग प्रत्यंग पर रख कर ही दाह कर्म किया जाता था।

गोहत्या तथा गो मांसाहार के बारे में प्रमाणों की यह स्थिति है। इसमें से कौन सा पक्ष सत्य माना जाए? यथार्थ बात मालूम देती है कि शतपथ ब्राह्मण और आपस्तम्ब धर्म सूत्र के ऐसे लेख जो हिन्दुओं को गोहत्या तथा गो मांसाहार का विरोधी बनाते हैं केवल अत्यधिक गोहत्या तथा गो मांसाहार से विरत करने वाला अभियान है। वे पूर्णतः गो हत्या का निषेध नहीं करते हैं। वास्तव में इन उपदेशों से यही सिद्ध होता है कि उस समय गोमांसाहार बहुत ही प्रचलित हो गया था। इन प्रेरणाओं के बावजूद गोहत्या तथा गोमांसाहार जारी रहा। यह आदेश प्रायः व्यर्थ हो जाते थे, यह आर्यों के महान ऋषि याज्ञवल्क्य के आचरण से सिद्ध होता है। शतपथ ब्राह्मण से जो प्रथम अनुच्छेद ऊपर उद्धृत किया गया है वह वास्तव में याज्ञवल्क्य को ही संबोधित करके कहा गया है। याज्ञवल्क्य ने क्या उत्तर दिया? उस उपदेश को सुन कर याज्ञवल्क्य बोला µ

फ्यदि वह कोमल है तो मैं उसे खाता हूं।’’

एक समय हिंदू गोहत्या करते रहे हैं और गोमांसाहार भी करते रहे हैं-यह बात बौद्ध सूत्रों में दिए गए यज्ञों के वर्णन से बहुत अच्छी तरह सिद्ध होती है। बौद्ध सूत्रों का समय वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों के बहुत बाद का है जिसके परिणाम में गायों और अन्य पशुओं का वध होता था, वह विकराल है। ब्राह्मणों ने धर्म की आड़ में जो हत्या कांड किया उसका हिसाब लगाना असंभव है। इस पाशविकता का अनुमान लगाना आकाश के तारे गिनने के समान है। फिर भी बौद्धवाघ्मय से इसके संकेत अवश्य मिलते हैं। कूटदंत सूत्र में इसका उदाहरण है। जब बुद्ध कूटदंत नामक ब्राह्मण को पशुहत्या न करने का उपदेश देते हैं बुद्ध अभिव्यंजना शैली में उनका कहना हैःµ

फ्और आगे हे ब्राह्मण उस यज्ञ में न बैल मारे गए, न अजा, न कुक्कुट, न मांसल सूअर, न कोई अन्य प्राणी। मण्डप खम्ब के लिए कोई वृक्ष नहीं काटा गया। यज्ञ मण्डप के पास बिछाने के लिए कोई दूब घास भी नहीं छीली गई और न उसमें कार्यरत दास अथवा सेवक भी मार के भय से कार्य करते थे, न ही उस श्रमसाध्य