अध्याय 12
गैरµब्राह्मणों ने गोमांस खाना क्यों छोड़ा?
हिंदुओं के विभिन्न वर्गों के खान-पान की आदत और प्रकृति और रीति उसी प्रकार स्थित और जड़ीभूत हो गई है जैसे उनके अन्य रीति-रिवाज। जिस प्रकार हम रीति-रिवाजों के आधार पर हिंदुओं को वर्गीकृत कर सकते हैं उसी प्रकार उनके
खान-पान की आदतों के आधार पर भी उनका वर्गीकरण किया जा सकता है। जिस प्रकार साम्प्रदायिक दृष्टि से हिंदू या तो शूद्र होते हैं या वैष्णव, उसी प्रकार मांसाहारी होते हैं या शाकाहारी।
साधारणत् मांसाहारी और शाकाहारी का यह वर्गीकरण पर्याप्त हो सकता है। लेकिन यह मानना होगा कि यह पूर्ण वर्गीकरण नहीं है। व्यापक वर्गीकरण के लिए हमें मांसाहारी वर्ग को दो हिस्सों में बांटना होगा।
(1) जो मांस तो खाते हैं किंतु गोमास नहीं खाते। (2) जो गोमांस भी खाते हैं। दूसरे शब्दों में खान-पान को लेकर हिंदू समाज के तीन हिस्से होंगेः (1) फ्जो शाकाहारी हैंय् (2) फ्जो मांसाहारी हैय् किंतु गोमांस नहीं खाते। (3) जो गोमांस भी खा लेते हैं। इसी वर्गीकरण के अनुरूप हिन्दू समाज के तीन वर्ग या वर्ण हैं। (1) ब्राह्मण, (2) अब्राह्मण, और (3) अछूत। यद्यपि यह वर्गीकरण हिन्दू समाज के चातुर्वर्ण्य के अनुरूप नहीं है फिर भी यह विद्यमान तथ्यों के अनुरूप तो है ही। ब्राह्मणों ख्1, में ही एक वर्ग है जो शाकाहारी है और अब्राह्मणों में वह वर्ग है जो मांस खाता है किंतु गोमांस नहीं खाता तथा अछूतों में गोमांस भी खाने वाला वर्ग है।
यह त्रिविध वर्गीकरण पर्याप्त है और वस्तु स्थिति के अनुसार है। कोई भी यदि इस वर्गीकरण पर ध्यान से विचार करे तो अब्राह्मणों की स्थिति उसका ध्यान विशेष रूप से आकृष्ट करेगी ही। शाकाहारी दोनों समय में आता है। मांसाहारी होना तो समझ में आता है, लेकिन यह बात समझ में आनी कठिन है कि एक मांसाहारी केवल एक प्रकार के मांस अर्थात गो मांस के खाने की क्यों आपत्ति करे? यह एक गुत्थी
- भारत में ब्राह्मणों की दो श्रेणियों हैं (1) पंच द्रविड़ और (2) पंच गौड़। पहला वर्ग शाकाहारी है, दूसरा नहीं।