गैर-ब्राह्मणों ने गोमांस खाना क्यों छोड़ा?
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की हिंसा करने के लिए वन में आग न लगाई जाए। एक जीव को मार कर दूसरे जीव को न खिलाया जाए। प्रति चार चार महीने की तीन ऋतुओं को तीन पूर्णमासी के दिन, पौष मांस की पूर्णमासी के दिन, चतुर्दशी अमावस्या और प्रतिपदा के दिन तथा प्रत्येक उपवास के दिन मछली न मारी जाए और ना ही बेची जाए। इन सब दिनों में हाथियों के वन में तथा तालाबों में कोई भी दूसरे प्रकार के प्राणी न मारे जाएं। प्रत्येक पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या या पूर्णिमा तथा पुष्ट और पुनर्वसु नक्षत्र में और प्रत्येक चार महीने के त्योहारों के दिन बैल बधिया न किया जाए तथा बकरा, भेड़ा, सुअर और इसी तरह के दूसरे प्राणियों को बधया नहीं किया जाए। पुण्य और पुनर्वसु नक्षत्र के दिन प्रत्येक चातुर्मास्य की पूर्णिमा के दिन और प्रत्येक चातुर्मास्य के शुक्ल पक्ष में घोड़े और बैल को न दागा जाए। राज्याभिषेक के बाद 26 वर्ष के अंदर मैंने 25 बार कारागार से लोगों को मुक्त किया है।’’ ऐसा था अशोक का विधान।
III
अब हम मनु पर विचार करेंगे। उस के कानूनों में मांसाहार के संबंध में निम्नलिखित व्यवस्था हैःµ
5.11. कच्चा मांस खाने वाले गिद्ध आदि और गांव में रहने वाले कुकुर, कबूतर
आदि पक्षी का मांस न खाएं। जिसके नाम का निर्देश न किया गया हो
ऐसे सुमधारी घोड़े, गधे आदि भी अभक्ष्य हैं। टिटिहरी पक्षी का मांस भी
वर्जित है।
5.12. गौरेया, पारिया, पपीहा, हंस, चकवा, ग्राम कुक्कुट (मुर्गा) वल्लक, बत्तख,
रज्जुवल, जलकाक, सुग्गा और मैनाµइन पक्षियों का मांस न खाएं।
5.13. कठफोड़ों और जिनके बगुल झिल्ली से जुड़े हों वे जल मुर्गा, नख से
विदीर्ण कर खाने वाला बाज आदि और पानी में डूबकर मछली खाने
वाला पक्षी, वधस्थान का मांस और सूखा मांस खाना वर्जित है।
5.14. बगुला, बलाका, द्रोणकाक, खंजन, मछली खाने वाले जल जीव (मगर
आदि) ग्राम्य शूकर और सब प्रकार की मछलियां न खाएं।
5.15. जो जिसका मांस खाता है वह उसका मांस खाने वाला कहलाता है। मछली
सबका मांस खाती है, जो मछली खाता है वह सब मांसों का खाने वाला
है। इसलिए मछली न खाएं।
5.16 पाटीन (कुआरा) और रोहित (रोहू) मछली हव्य कव्य के लिए विहित
है। राजीव, सिंहतुण्ड और शल्क वाली सब मछलियां खाद्य हैं।
5.17 अकेले विचरने वाले और रहने वाले सर्पादि जीवों को भक्ष्यों में कहे गए
वे पशु-पक्षी जो परिचित न हों उन्हें और पंचनख वाले वानरादि प्राणियों