ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?
109
फ्अध्वर्यु कहता है हम यूप को अभिषेक कहते हैं। अपेक्षित मंत्र पढ़ो। होता मंत्र पढ़ता है अंजतित्वां अध्वरे (3, 8, 1,) अर्थात् हे वृक्ष! पुरोहित दिव्य मधु से तेरा स्वागत करते हैं। यदि तू यहां सीधा खड़ा है अथवा यदि तू अपनी माता (पृथ्वी) पर लेटा हुआ है तो हमें धन दे। फ्दिव्य मधुय् पिघला हुआ मक्खन है जिससे पुरोहित यूप का अभिषेक करते हैं। दूसरे आधे मंत्र हमें दे आदि का अर्थ है फ्चाहे तुम खड़े हो चाहे लेटे हो हमें धन दो।य्
फ्तब होता दोहराता है, जातो जायते सुदिनत्वे (3, 8, 5) अर्थात् उत्पत्ति के बाद वह (यूप) अपने जीवन के मध्यकाल में मरणशील मनुष्यों के यज्ञ के उपयोग में आता है। बुद्धिमान लोग उसे यूप (को) सजाने में संलग्न हैं। वह देवताओं के व्याख्यान पटु दूत की तरह अपना स्वर ऊंचा करता है कि देवता उसे सुन सकें। वह (यूप) जात अर्थात् उत्पन्न कहलाता है क्योंकि वह इस श्लोक के पहले चरण के उच्चारण से पैदा होता है। वर्धमान (शब्दों से) अर्थात् बढ़ना से वे उसे (यूप को) इस प्रकार बढ़ाते हैं। पुनन्ति (शब्द से) अर्थात् पवित्र करना, सजाना, वे उसे इस प्रकार पवित्र करते हैं। वह एक व्याख्यान पटु दूत शब्दों से देवताओं को यूप के अस्तित्व की सूचना देता है।य्
फ्होता यत् स्तंभ अभिषेक के संस्कार को समाप्त करता है। उस समय वह पढ़ता हैःµ युवा सुवासा परिविताः (3, 8, 4) अर्थात् बंदनवार सज्जित यूप आ पहुंचा है वह उन सब वृक्षों से जो कभी भी उत्पन्न हुए हों बढ़ कर बुद्धिमान पुरोहित अपने मन के सुव्यवस्थित विचारों के मंत्र पाठ द्वारा उसे उठाते हैं। पट्टी से (सजा हुआ) यूप जीवनदायिनी वायु (आत्मा) है जो शरीर के अंगों द्वारा ढका है। वह श्रेष्ठ है इत्यादि शब्दों से उसका अर्थ है कि वह (यूप) बढि़या होता जा रहा है (अधिक श्रेष्ठ सुंदर) इस मंत्र के बल से।य्
अगला संस्कार आग से यज्ञ स्तंभ की परिक्रमा करना है। इस संबंध में ऐतरेय ब्राह्मण का कथन [*] हैःµ
फ्जब (पशु) के चारों ओर आग घुमाई जाती है तो अध्वर्यु होता से कहता हैµअपना मंत्र पाठ करो। तब होता को संबोधित करके गायत्री छंद में रचे गए तीन मंत्रों का पाठ करता है। अग्नि होता वा अध्वेरे (4, 15, 1-3) अर्थात् (1) हमारा पुरोहित, अग्नि, एक घोड़े की तरह घुमाया जा रहा है। यह देवताओं में यज्ञ का देवता है। (2) एक रथी की तरह अग्नि यज्ञ के पास से तीन बार गुजरता है। वह देवताओं के पास आहुति ले जाता है। (3) भोजन का अधिष्ठाता अग्नि ऋषि आहुति के गिर्द घूमा, यह यज्ञकर्ता को धन देता है।य्
* ऐतरेय ब्राह्मण (मार्टिन हग) II, पृ. 84-86