ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?
हैःµ
111
‘‘मां, पिता, भाई, बहन, मित्र और साथियों को चाहिए कि वे वध करने के लिए पशु का समर्पण करें। (जिस समय ये शब्द कहे जाते हैं वे उस पशु को पकड़ लेते हैं जिसके बारे में यह माना जाता है कि वह माता-पिता आदि के द्वारा सर्वथा परित्यक्त है)।य्
इस निर्देश को पढ़ कर आश्चर्य होता है कि लगभग हर किसी के लिए इसकी क्या आवश्यकता है कि वह पशु को यज्ञ के लिए समर्पित करने के संस्कार में हिस्सा ले। कारण स्पष्ट है। यज्ञ में हिस्सा लेने के अधिकारी पुरोहितों की कुल संख्या सत्रह थी। स्वाभाविक तौर पर वे मृत पशु की पूरी की पूरी लाश अपने ही लिए ख्2, ले लेना चाहते थे।
वास्तव में यदि उन्हें सारी देह अपने ही लिए न मिले तो वे सत्रह पुरोहितों में कुछ ठीक-ठीक बांट भी नहीं सकते थे। विधानानुसार ब्राह्मण उस पशु पर किसी प्रकार का अधिकार तब तक नहीं जता सकते थे जब तक हर आदमी पशु के मांस के अपने अधिकार को सर्वथा छोड़ न दे। इसीलिए उक्त निर्देश में जो आदमी पशु के साथ आया हो उसे भी अपना अधिकार छोड़ देने का आदेश है।
अब पशु का वध करने का विधि-विधान आता है। ऐतरेय ब्राह्मण पशु की हत्या करने के विधि-विधान का ब्यौरा इस प्रकार ख्3, देते हैंः-
फ्इसके पैर उत्तर की ओर करो, उसकी आंखें सूर्य की ओर, उसकी प्राण वायु, इसकी श्रवण शक्ति दिशाओं की ओर, इसका शरीर पृथ्वी को सौंप दो। इस प्रकार (होतृ) होता इसे लोकों के साथ जोड़ देता है।य्
फ्सारी चमड़ी बिना काटे उतार दो। नाभि काटने से पहले ओझड़ी को चीर दो (इसका मुंह बंद करके) इसका दम घोट दो और इसकी सांस अंदर ही रोक दो। इस प्रकार वह (होतृ) होता पशुओं में श्वास डालता है।य्
फ्इसकी छाती का एक टुकड़ा, बाज की शक्ल का, बाजुओं के दो टुकड़े कुल्हाड़ी की शक्ल के, अगले पांव के दो टुकड़े धान की बालों के शक्ल के, कंधों के दो टुकड़े दो काइयों की शक्ल के, कमर के नीचे का हिस्सा अटूट रहे, जांघ के दो टुकड़े ढाल की शक्ल के, दोनों घुटनों के दो टुकड़े पत्तों की शक्ल के, इसकी 26 पसलियां क्रमशः निकाल ली जाएं। इसके प्रत्येक अंग को सुरक्षित रखा जाए। इस
मार्टिन हग II, पृ. 86
दरअसल पूरा शव ब्राह्मण ले जाते थे। यजमान और उसकी पत्ती को एक-एक टांग ही दी जाती थी।
मार्टिन हग II, पृ. 86-87