112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
प्रकार वह उसके सारे अंगों से लाभ पाता है।य्
यज्ञ के लिए पशुओं की हत्या करने के संबंध में दो संस्कार बच गए। एक है ब्राह्मण पुरोहित को, जिसने बधिक का काम किया, हत्या के पाप से मुक्त करने का संस्कार। सिद्धांत रूप में वे हत्यारे ठहरते हैं क्योंकि पशु केवल यज्ञकर्ता का स्थ ानापन्न ही है। उन्हें हत्या के परिणाम से बचाने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण ने होतृ होता को निम्नलिखित आज्ञा दी ख्1, हैः-
फ्ओझड़ी को न काटो, जो उल्लू की शक्ल की होती है। और हे वध करने वालो! तुम्हारे बच्चों अथवा तुम्हारी संतान में भी कोई ऐसा न हो जो उसे काट दे।’’ इन शब्दों को कह कर वह देवताओं और मनुष्यों दोनों के मध्य में जो हत्यारे हैं उनको देता है।
तब होतृ होता तीन बार कहता है हे अध्रिगु, और हे अन्य लोगों पशु का वध करो, इसे अच्छी तरह करो, इसका वध करो, हे अध्रिगु पशु की हत्या हो चुकने पर उसे तीन बार कहना चाहिए इस हत्या का दुष्परिणाम हमसे दूर करो, क्योंकि देवताओं में अध्रिगु है जो (पशु को) चुप कराता है और अध्रिगु ‘दूर दूर’ कहे, जो उसे नीचे गिराता है। यह शब्द कह कर पशु को उन्हें सौंप देता है, जो उसका मुंह बंद करके उसे चुप कराते हैं, और उन्हें जो उसका वध कर डालते हैं।
तब होता जाप करता है। बधिकों, तुम्हारा पुण्य यहां हमारे पास रहे, तुम्हारा पाप अन्यत्र चला जाए। होता उस कथन से पशु वध की आज्ञा देता है। क्योंकि अग्नि जब देवताओं का क्षेत्र था तो उसने भी इन्हीं शब्दों में (पशु के) वध की आज्ञा दी थी।
अंत में जप से होता उन सब को जो पशु का स्वास बंद करते हैं अथवा जो उसका वध करते हैं, उस पाप के दुष्परिणाम से मुक्त करता है जो उनके किसी टुकड़े को अतिशीघ्रता से काटने, किसी टुकड़े को अति विलम्ब से काटने, किसी टुकड़े को बहुत बड़ा काटने और किसी टुकड़े को बहुत छोटा काटने के परिणामस्वरूप हो गया हो। होता इसका आनंद लेते हुए अपने आप को तमाम पापों से मुक्त करता है और पूरी आयु प्राप्त करता है और इससे यज्ञकर्ता भी अपनी संपूर्ण आयु प्राप्त करता है। जिसको यह ज्ञान है वह अपनी पूरी आयु प्राप्त करता है।
इससे आगे ऐतरेय ब्राह्मण मृत पशु के शरीर के भाग को ठिकाने लगाने के प्रश्न पर विचार करता है। उसका निदेश हैःµ
- मार्टिन हग II, पृ. 89-90