ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?
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फ्इसका गोबर छिपाने के लिए जमीन में एक गड्ढा खोदो। गोबर वनस्पति से बनता है, क्योंकि पृथ्वी वनस्पति का स्थान है। इसलिए होता अंत में गोबर को उसके उचित स्थान पर रखता है। प्रेतात्माओं को रक्त दो, क्योंकि एक बार देवताओं ने प्रेतात्माओं को हविर्यज्ञ पूर्णिमा तथा प्रतिपदा के दिन की बलि का उनका हिस्सा उन्हें न दे भूसी और छोटा धान मात्र दिया और फिर उन्हें सोम तथा पशु मांस का निकाल कर रक्त दिया। इसलिए होता इस मंत्र का जाप करता हैµ प्रेतात्माओं को छोड़ दो। उनका यह हिस्सा देकर फिर उन्हें यज्ञ में से कोई और चीज लेने से वंचित कर दिया जाता है। वे कहते हैं दुरात्माओं को यज्ञ में याद नहीं करना चाहिए, राक्षस, असुर, दुरात्मा कोई भी हों क्योंकि यज्ञ बिना विघ्न बाधा के होना चाहिए। लेकिन दूसरों का मत है कि उन्हें याद करना चाहिए क्योंकि यदि कोई किसी को उसके हिस्से से वंचित करता है तो जिसे वह वंचित करेगा वह उसे कष्ट देगा। यदि वह अपने दंड से बच गया तो उसके पुत्र को और यदि वह भी बच गया तो उसके पौत्र को कष्ट भोगना पड़ेगा। इस प्रकार जो कष्ट तुम्हें मिलता वह कष्ट तुम्हारे पुत्र या पौत्र को मिलता है।य्
यदि होता संबोधन करे तो उसे मन्द स्वर में करना चाहिए क्योंकि मन्द स्वर और प्रेतात्माएं दोनों ही छिपी सी रहती हैं। यदि वह उस स्वर में बोलता है तो यह प्रेतात्माओं की आवाज में मिलता है और वह राक्षस स्वर (एक भयानक आवाज) में बोलने लग सकता है। जिस वाणी में क्रोधी तथा शराबी आदमी बोलते हैं वह राक्षसों की बोली है। जिसे यह ज्ञान है वह न स्वयं क्रोधी होगा न उसकी संतान वैसी होगी।
तब अंतिम संस्कार बाकी रह जाता हैµपशु के शरीर के अंग देवी देवताओं को समर्पित करने का संस्कार है। यह मनोत ख्1, कहलाता है। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसारः-
अध्वर्यु होता से कहता हैµ मनोत के लिए काटे गए यज्ञ के पशु के अंगों को देवताओं को समर्पित करने के उपर्युक्त मंत्र कहो। वह तब इस मंत्र को दोहराता हैµ ‘हे अग्नि तुम प्रथम मनोत ख्2, हो।’
अब पशु के मास के बंटवारे का प्रश्न शेष रह गया। इस विषय पर ऐतरेय ब्राह्मण का निर्णय इस प्रकार ख्3, हैःµ
अब बलि के पशु के भिन्न-भिन्न अंगों को पुरोहितों में बांटे जाने का प्रश्न उप स्थित होता है। हम इसका वर्णन करेंगे। जबड़े की दोनों हड्डियों और जिह्ना प्रस्तोता को दी जानी चाहिए। बाज की आकृति में छाती उद्गाता को, गर्दन और ताल प्रतिहर्ता
ऐतरेय ब्राह्मण (मार्टिन हग) खण्ड-2, पृ. 93
मनोत उस देवता का नाम है जिसे बलि समर्पित होती है।
ऐतरेय ब्राह्मण (मार्टिन हग) खण्ड-2, पृष्ठ 441-42