13. ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने? - Page 129

114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

को, कमर के नीचे का दाहिनी ओर का हिस्सा होता को, बायां ब्रह्मा को, दाईं जांघ मैत्रवरण को, बाईं ब्राह्मणाच्छसों को, कंधे के साथ की दाईं ओर से अध्वर्यु को, बाईं मंत्रोच्चारण में साथ देने वालों उपमाताओं को, बायां कंधा प्रतिप्रस्तर को, दाएं बाजू का निचला हिस्सा नेष्टा को, बाएं बाजू का निचला हिस्सा पौत्र को, दाहिनी जांघ का ऊपर का भाग आच्छावक को, बाईं जांघ का ऊपर का हिस्सा अग्निघर को, दाएं बाजू का ऊपर का हिस्सा आत्रेय को, बाएं बाजू का ऊपर का हिस्सा सदस्य को, कमर की हड्डी और अंडकोष यज्ञ कराने वाले गृहस्थ को। दायां पांव भोज देने वाले गृहपत को, बायां पांव भोजन देने वाले गृहपति की भार्या को, ऊपर का होठ गृहपति और उसकी भार्या के समानाधिकार में है, जिसका बंटवारा गृहपति करेगा। पशु की पूंछ वे भार्याओं को देते हैं किंतु यह उन्हें किसी ब्राह्मण को ही देनी चाहिए। गर्दन पर मणिक और तीन कीकस ग्रावात्तुत को, तीनों कीकस और पीछे के मांसल हिस्से का अर्धांश वैकर्स उन्मेता को, गर्दन पर के मांसल हिस्से क्लोम को, उसका आधा हिस्सा वध करने वाले को। यदि वध करने वाला स्वयं ब्राह्मण न हो तो किसी ब्राह्मण को दे दें। सिर सुब्रहमण्य को देना चाहिए जो कल सोम यज्ञ के समय (स्वः सुत्या) बोला, सोम यज्ञ में यज्ञ की बलि बने पशु का वह हिस्सा जो यज्ञ भोज का है वह सब पुरोहितों का है, केवल होता के लिए वह ऐच्छिक है।

बलि के पशु के इन अंगों की संख्या 36 है। जिन श्लोकों से यज्ञ होता है प्रत्येक भाग उसके एक चरण का प्रतीक है। बृहती छंद में 36 शब्द खंड होते हैं और दिव्य लोक बृहती की प्रकृति के हैं। इस प्रकार पशु के 36 हिस्से करके वे इस लोक तथा स्वर्ग में जीवन लाभ करते हैं। और इह लोक और परलोक दोनों में प्रतिष्ठित होकर वे वहां विचरते हैं।

जो उपरोक्त रीति से पशु के मांस का बंटवारा करते हैं उनके लिए यह स्वर्ग सोपान बन जाता है। लेकिन जो इससे उलटा विभाजन करते हैं वे गुंडे और शरारती हैं जो केवल अपनी मांसाहार की तृष्णा के लिए पशु की बलि देते हैं। बलि के पशु का यह विभाग श्रुत के पुत्र देवभाग का आविष्कार है। जब वह इस जीवन में जी रहा था तो उसने इस रहस्य को किसी को भी नहीं सौंपा। किंतु किसी अलौकिक देव दूत ने वभु के पुत्र गिरिजा को सब समाचार कह दिया। उसके समय से पुरुष इसका अध्ययन करते हैं।

ऐतरेय ब्राह्मण में जो कुछ कहा गया है उससे दो बातें असंदिग्ध तौर पर स्पष्ट होती हैं। एक तो यह कि बलि के पशु के सारे मांस को ब्राह्मण ही ले लेते हैं। एक जरा से टुकड़े के अतिरिक्त वे यज्ञ कराने वाले गृहस्थ को भी कुछ न लेने देते थे।