ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?
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दूसरी बात यह है कि पशुओं का वध करने के लिए ब्राह्मण स्वयं कसाई का काम करते थे। सिद्धांत की दृष्टि से यज्ञ में जिस पशु की बलि दी गई है ब्राह्मणों को उसका मांस नहीं खाना चाहिए। यज्ञ का आधारभूत सिद्धांत है कि मानव देवताओं के प्रति अपने आपको बलिदान करता है। वह अपनी जान बचाने के लिए ही अपने बजाय पशु की बलि देता है। इसका यह आशय हुआ कि जो पशु का मांस खाता है वह आदमी का ही मांस खाता है, क्योंकि यहां पशु आदमी का ही स्थानापन्न है यह मत ब्राह्मणों के स्वार्थ के लिए बड़ा घातक था। ब्राह्मण बलि के पशु का सारा मांस आप ही हड़पना चाहते थे। ऐतरेय ब्राह्मण ने जब देखा कि इस मत को स्वीकार करने से ब्राह्मणों के हाथ से बलि के पशु के मांस के निकल जाने की आशंका है तो उसने प्रयत्नपूर्वक इस मत को सीधे-सीधे अस्वीकार करके उसकी व्याख्या ख्1, करने का प्रयत्न किया है।
फ्जो व्यक्ति यज्ञ के रहस्यों में दीक्षित होता है वह अपने आपको सब देवताओं के प्रति बलिदान कर देता है। अग्नि सब देवताओं का प्रतिनिधि है और सब देवताओं का प्रतिनिधि सोम है। जब वह यज्ञकर्ता पशु को अग्नि सोम की बलि चढ़ाता है तो वह अपने आपको सभी देवताओं के प्रति बलिदान होने से मुक्त कर देता है।य्
कहने वाले कहते हैं, अग्नि सोम को बलि दिए गए पशु का मांस न खाओ, जो कोई इस पशु का मांस खाता है वह मानव का मांस खाता है क्योंकि यज्ञकर्ता पशु की बलि चढ़ा कर अपने आपको बलिदान होने से बचाता है। लेकिन इस मत की ओर ध्यान देना आवश्यक है।
इन बातों के रहते, अब यह सिद्ध करने के लिए किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं कि ब्राह्मण न केवल गोमांसाहारी थे अपितु कसाई भी थे।
तब ब्राह्मणों ने पैंतरा क्यों बदला? हम उनके पैंतरा बदलने की बात के दो हिस्से करते हैं। पहला उन्होंने गोमांसाहार क्यों छोड़ दिया?
II
जैसा कि ऊपर दिखाया जा चुका है अशोक ने गोहत्या को कभी कानून से बंद नहीं किया था। यदि बंद किया भी था, तो एक बौद्ध सम्राट द्वारा बनाए गए कानून को ब्राह्मणों ने कभी नहीं माना है।
क्या मनु ने गोहत्या का निषेध किया? यदि उसने किया तो वह ब्राह्मणों के लिए
- ऐतरेय ब्राह्मण (हग) II, पृ. 80