116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
मान्य होगा और ब्राह्मणों में इस परिवर्तन की संतोषजनक व्यवस्था भी समझी जा सकती है। मनुस्मृति में निम्न श्लोक मिलते हैंःµ
5.46. जो प्राणियों को बांधने, मारने का क्लेश देने की इच्छा नहीं करता वह
सब जीवों का हित चाहने वाला अत्यंत सुख पाता है।
5.47. जो किसी प्राणी को दुख नहीं देता, वह जिस धर्म को मन से चाहता है,
जो कर्म करता है जिस पदार्थ पर ध्यान लगाता है वह उसे अनायास ही
प्राप्त करता है।
5.48. प्राणियों का हिंसा किए बिना कभी मांस उत्पन्न नहीं हो सकता पशुओं का
वध करना स्वर्ग का साधन नहीं है। अतः मांस खाना छोड़ देना चाहिए।
5.49. मांस का उत्पत्ति और प्राणियों के वध और बंधन (निर्दयता) होती है।
इस बात पर अच्छी तरह विचार कर सब प्रकार के मांस भक्षण को त्याग
देना चाहिए।
यदि इन श्लोकों को ठोस निषेध आज्ञाएं स्वीकार कर लें तो इनसे ही इस बात पर पर्याप्त व्याख्या हो जाती है कि ब्राह्मण मांसाहार छोड़कर शाकाहारी क्यों बन गए? लेकिन इन श्लोकों को कानून के रूप में निर्णायक निषेध स्वीकार करना असंभव है। या तो ये केवल प्रेरणाएं हैं अथवा प्रक्षेप हैं जो ब्राह्मणों को शाकाहारी बन जाने के बाद उनके कृत्य की प्रशंसा में बाद में जोड़ दिए गए। यह दूसरी बात ही ठीक है क्योंकि मनुस्मृति के इस पांचवे अध्याय में ही आने वाले दूसरे श्लोकों से सिद्ध होता हैµ
5.28. प्रजापति ब्रह्मा ने यह सब जीव का खाद्य ही कल्पित किया है। स्थावर
(अन्न, फल आदि) और जंगम पशु, पक्षी आदि सब जीव-जीवों के ही
भोजन हैं।
5.29. चर-जीवों का अन्न (अचर, तृण आदि) हैं, दाढ़ वालों (व्याघ्र आदि)
का बिना दाढ़ के जीव (हिरण आदि) हैं। हाथ वालों (मनुष्य) का अन्न
बिना हाथ के जीव (मछली आदि) हैं, और शेरों (सिंह आदि) का भक्ष्य
भीरू (जीव) हैं।
5.30. खाने वाला जीव खाने योग्य प्राणियों को प्रतिदिन खाकर भी दोष का भ
ागी नहीं होता, क्योंकि ब्रह्मा ने ही खाद्य और खाने वाले दोनों का निर्माण
किया है।
5.56. मांस खाने, मद्यपान करने और मैथुन करने में दोष नहीं है, क्योंकि यह
जीवों की प्रवृत्ति है, परंतु उससे निवृत्त होना महाफलदायी है।य्
2.27. फ्मंत्रों द्वारा पवित्र किया मांस खाना चाहिए। ब्राह्मणों को शास्त्रोक्त विधि