13. ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने? - Page 132

ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?

117

से मांस खाना चाहिए और प्रांणों पर संकट आ पड़ने पर मांस अवश्य

खाना चाहिए।य्

5.31. फ्यज्ञ के निमित्त मांस भक्षण को दैव विधि कहा गया है। इसके विरुद्ध

मांस भक्षण राक्षसी वृत्ति है।य्

5.32. फ्खरीद कर या स्वयं कहीं से लाकर या स्वयं मारकर अथवा किसी का

दिया हुआ मांस देवताओं और पितरों को अर्पित कर खाने वाला दोषी नहीं

होता।य्

5.42. फ्वेद के तत्व को जानने वाला द्विज इन पूर्वोक्त विधि कर्मों से पशु वध

करता हुआ स्वयं को और पशु को उत्तम गति प्राप्त करता है।य्

5.39. फ्स्वयंभू ब्रह्मा ने यज्ञ के लिए और सब यज्ञों की समृद्धि के लिए पशुओं को

स्वयं बनाया है, इसलिए यज्ञ में पशु वध को वध नहीं कहा जाता।य्

5.40. फ्औषधियां, पशु, वृक्ष, कछुए आदि और पक्षी ये सब यज्ञ के निमित्त मारे

जाने पर फिर उत्तम योनि में जन्म ग्रहण करते हैं।य्

मनु इससे आगे जाते हैं और मांसाहार अनिवार्य ठहराते हैं। निम्नलिखित श्लोक ध्यान देने योग्य हैःµ

5.35. फ्यथाविधि नियुक्ति होने पर श्राद्ध और मधुपर्क में जो मनुष्य मांस नहीं

खाता वह मरने के अनन्तर इक्कीस जन्म तक पशु होता है।य्

स्पष्ट है कि मनु ने मांसाहार का निषेध नहीं किया। मनु ने गोहत्या का निषेध नहीं किया। यह मनु से ही सिद्ध है। पहली तो यह बात है कि मनुस्मृति में गो का उल्लेख केवल उन निम्नलिखित नियमों की सूची में मिलता है जो मनु के अनुसार स्नातकों के लिए मान्य होने चाहिएं।

  1. गो का सूंघा हुआ भोजन एक स्नातक के लिए निषिद्ध है। ख्1,

  2. जिस रस्सी में बछड़ा बंधा हुआ हो उसे लांघना एक स्नातक के लिए

निषिद्ध है। ख्2,

  1. गो-ब्रज (गोशाला) में लघु शंका करना स्नातक के लिए निषिद्ध है। ख्3,

  2. गो की ओर मुंह करके मल-मूत्र विसर्जन करना स्नातक के लिए निषिद्ध

है। ख्4,

  1. मनु. 4. 209

  2. मनु. 4. 38

  3. मनु. 4. 45

  4. मनु. 4. 48