ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?
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देने की है कि मनु गो को अपवाद स्वरूप नहीं स्वीकार करते। उसका स्पष्ट अर्थ है कि मनु को गो मांसाहार में कोई आपत्ति नहीं थी।
मनु ने गो हत्या को अपराध नहीं ठहराया। उसकी दृष्टि में पापकर्म दो प्रकार के हैंःµ
(1) महापातक (2) उपपातक
महा पातकों में से कुछ ये हैंःµ
11.54. ब्रह्म-हत्या, मद्यपान, चोरी, गुरुपत्नीगमनµ ये (चारों) महापातक कहे
गए हैं और इनका संसर्ग भी (महापातक) है।
उपपातक अर्थात् मामूली अपराधों में से कुछ ये हैंःµ
11.59. गोवध, जाति और कर्म से दूषित मनुष्यों से यज्ञ कराना, परस्त्रीगमन,
अपने को बेचना, गुरु, माता, पिता की सेवा का त्याग, स्वाध्याय का
त्याग, स्मार्त अग्नि का त्याग और पुत्र के भरण-पोषण का त्याग।
इससे यह स्पष्ट है कि मनु की दृष्टि में गो हत्या केवल एक मामूली पाप था ‘उपपातक’। यह निंदनीय तभी था जब गो की हत्या बिना किसी उचित तथा पर्याप्त कारण के हो। और यदि ऐसा न हो तो यह कोई बहुत घृणित कर्म नहीं था। याज्ञवल्क्य ख्1, का मत भी ऐसा ही था।
इस बात से यही सिद्ध होता है कि ब्राह्मण पीढ़ी दर पीढ़ी गोमांसाहारी बने रहे। उन्होंने गोमांसाहार क्यों छोड़ दिया? वे एक दम दूसरी सीमा पर चले गए। उन्होंने गोमांस ही नहीं मांस खाना भी छोड़ दिया और शाकाहारी बन गए। ये एक साथ दो क्रांतियां हो गईं। जैसा दिखाया गया है उन्होंने यह अपने दैवी स्मृतिकार मनु की शिक्षा के कारण नहीं किया गया है। ब्राह्मणों ने ऐसा क्यों किया? क्या यह किसी सिद्धांत के कारण अथवा किसी अभिप्रेत समरनीति के तहत ऐसा हुआ?
इस प्रश्न के दो उत्तर हैं। एक उत्तर तो यह है कि गो की पूजा उस अद्वैत दर्शन का परिणाम है जिसकी शिक्षा है कि समस्त विश्व में ब्रह्म व्याप्त है और इसलिए सारा जीवन चाहे वह मनुष्य का हो, चाहे पशु का हो, पवित्र है। स्पष्ट ही है कि यह व्याख्या सन्तोषजनक नहीं है। पहले तो इसका वास्तविकता से कोई मेल नहीं। वेदांत सूत्र जो ब्रह्म की एकता का उपदेश देते हैं, यज्ञों के लिए पशु हत्या को वर्जित नहीं करते। यह दूसरे अध्याय के 1.28वें सूत्र से स्पष्ट है। दूसरे यदि यह परिवर्तन वेदांत के आदेश को आचरण में उतारने का परिणाम है तो फिर गो तक क्यों सीमित है? यह दूसरे सभी पशुओं पर भी लागू होना चाहिए था।
- याज्ञवल्क्य, III 227 और III 234