13. ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने? - Page 135

120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

दूसरी व्याख्या ख्1, पहली की अपेक्षा अधिक बेतुकी है। उसके अनुसार ब्राह्मण के जीवन के इस परिवर्तन का कारण आत्म परिवर्तन का सिद्धांत है। इस व्याख्या का भी वास्तविकता से कोई मेल नहीं। वृहदारण्यक उपनिषद में आत्मा के पुनर्जन्म ग्रहण करने के सिद्धांत का प्रतिपादन है, तो भी उसका कहना है यदि मनुष्य यह चाहता है कि उसे मेधावी पुत्र उत्पनन हो तो वृषभ या बैल के मांस के साथ भात और घी मिला कर खाना चाहिए। फिर इसका भी क्या कारण है कि उपनिषदों में मनु के समय अर्थात् लगभग 400 वर्ष बाद तक ब्राह्मणों के आचरण पर इस सिद्धांत का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तीसरे यदि आत्मा के पुनर्जन्म के सिद्धांत के कारण ब्राह्मण शाकाहारी बने तो अब्राह्मण भी क्यों नहीं बने?

मेरी दृष्टि में यह ब्राह्मणों के चातुर्य का एक अंग है कि वे गोमांसाहारी न रह कर गोपूजक बन गए। इस गोपूजा के रहस्य का मूल बौद्धों और ब्राह्मणों के संघर्ष में तथा उपायों में खोजना होगा जो ब्राह्मणों ने बौद्धों से बाजी मार ले जाने के लिए किए। बौद्धों और ब्राह्मणों में तू डाल-डाल मैं पात-पात की होड़ भारतीय इतिहास की एक निर्णायक घटना है। इस वास्तविकता को अंगीकार किए बिना हिंदू धर्म के कुछ अंगों की व्याख्या हो ही नहीं सकती। दुर्भाग्यवश भारतीय इतिहास के विद्यार्थियों की दृष्टि से इस बौद्ध-ब्राह्मण संघर्ष का महत्त्व एकदम परोक्ष रहा है। वे जानते हैं कि ब्राह्मणवाद नाम की चीज रही है लेकिन वे इस बात से एकदम अपरिचित प्रतीत होते हैं कि ये मत लगभग 400 वर्ष तक एक दूसरे पर बाजी मार ले जाने के लिए संघर्ष करते रहे और भारतीय धर्म, समाज तथा राजनीति पर उनके इस संघर्ष की अमिट छाप विद्यमान है।

यहां सारे संघर्ष की कथा का वर्णन करने के लिए स्थान नहीं है। दो चार महत्त्व की बातों का उल्लेख किया जा सकता है। एक समय था जब अधिकांश भारतवासी बौद्ध थे। यह सैंकड़ों वर्षों तक भारतीय जनता का धर्म रहा। इसने ब्राह्मणवाद पर ऐसे आक्रमण किए जैसे इससे पहले किसी ने नहीं किए थे। ब्राह्मणवाद अवनति पर था और यदि एकदम अवनति पर नहीं तो भी उसे अपने अस्तित्व की ही चिंता हो रही थी। बौद्ध धर्म के विस्तार के कारण ब्राह्मणों का प्रभुत्व न राजदरबार में रहा और न जनता में। वे इस पराजय से पीडि़त थे, जो उन्हें बौद्ध धर्म के हाथों मिली थी और अपनी शक्ति तथा प्रभुत्व को पुनः प्राप्त करने के लिए हर प्रकार से प्रयत्नशील थे। जनता के मन पर बौद्ध धर्म का ऐसा गहन प्रभाव पड़ चुका था और वह उससे इतनी अधिक प्रभावित थी कि ब्राह्मणों के लिए और किसी भी तरह बौद्ध धर्म की बराबरी कर सकना एकदम असंभव था।

उसका एक ही उपाय था कि वे बौद्धों के जीवनदर्शन को अपनाएं और इस मामले में उनसे भी चार कदम आगे बढ़ जाएं। बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद बौद्धों ने

  1. काणे का धर्मशास्त्र, अध्याय 2. भाग-2, पृष्ठ 776