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ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?

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बुद्ध की मूर्तियां तथा स्तूप बनाने आरंभ किए। ब्राह्मणों ने उसका अनुसरण किया। उन्होंने अपने मंदिर बनाए और उनमें शिव, विष्णु, राम, कृष्ण आदि की मूर्तियां स्थापित कीं। उद्देश्य इतना ही था कि बुद्ध मूर्ति पूजा से प्रभावित जनता को किसी न किसी तरह अपनी ओर आकर्षित करें। इस प्रकार जिन मंदिरों और मूर्तियों का हिंदू धर्म में कोई स्थान नहीं था उनके लिए स्थान बना। बौद्धों ने उस ब्राह्मण धर्म को त्याग दिया था जिसमें पशु बलि वाले और विशेष रूप से गोवध वाले यज्ञादि होते थे। गो वध के बारे में बौद्धों की आपत्ति का जनता पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। इसके दो कारण थेµ एक तो वह लोग कृषि प्रधान थे और दूसरे गो बहुत उपयोगी थी। अधिक संभावना यही है कि उस समय ब्राह्मण गो घातक समझे जाकर घृणा के पात्र बन गए थे। ठीक वैसे ही जैसे अतिथि भी गोश्त की घटनाओं के कारण घृणित समझे जाने लगे थे। क्योंकि जब भी कोई अतिथि आता था तभी सम्मान में गो हत्या करनी पड़ती थी। ऐसी परिस्थिति में अपनी स्थिति सुधारने के लिए ब्राह्मण यज्ञ रूप में जो पूजा करते थे और उसके साथ जो गोवध होता था उसे छोड़ देने में ही ब्राह्मणों ने अपना हित समझा।

गोमांसाहार छोड़ने में ब्राह्मणों का उद्देश्य बौद्ध भिक्षुओं से उनकी श्रेष्ठता छीन लेना ही था। यह बात ब्राह्मणों के शाकाहारी बन जाने से सिद्ध होती है। अन्यथा ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बना? इसका उत्तर यही है कि बिना शाकाहारी बने वह पुनः उस स्थान को प्राप्त कर ही नहीं सकता था जो बौद्ध धर्म के प्रसार के फलस्वरूप उसके पांव के नीचे से खिसक चुका था। इस संबंध में यह बात स्मरण रखने की है कि बौद्धों की तुलना में एक बात को लेकर ब्राह्मण जनता की दृष्टि में बहुत हीन पड़ता था। यह बात पशु वध की थी जो ब्राह्मणवाद की जड़ थी और जिसका बौद्ध धर्म एकदम विरोधी था। यह स्वाभाविक है कि ऐसी जनता में जो कृषि पर निर्भर करती हो बौद्ध धर्म के प्रति आदर और उस ब्राह्मण धर्म के प्रति घृणा हो जिसमें अन्य पशुओं के साथ गोओं और बैलों का भी वध होता हो। अपने विगत सम्मान को बचाने के लिए ब्राह्मण क्या कर सकते थे सिवाय इसके कि बौद्ध भिक्षुकों से भी एक कदम आगे जाकर न केवल गोमांस भक्षण ही छोड़ दें वरन शाकाहारी बन जाएं। शाकाहारी बनने में ब्राह्मणों का यही उद्देश्य था। यह कई तरह से सिद्ध हो सकता है।

यदि ब्राह्मणों ने पशु यज्ञ को बुरा मान कर सिद्धांत की दृष्टि से अपना आवरण बदला तो उनके लिए केवल इतना ही पर्याप्त था क वे यज्ञों के लिए पशुओं का वध करना बंद कर देते उनके लिए शाकाहारी बनना आवश्यक न था किंतु वे शाकाहारी बन कर रहे। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी दृष्टि गूढ़ थी और एक दूसरी तरह भी उनके लिए शाकाहारी बनना एकदम अनावश्यक था क्योंकि बौद्ध भिक्षु भी शाकाहारी नहीं थे। इस कथन से कुछ लोगों को आश्चर्य हो सकता है क्योंकि सामान्य धारणा यह है कि अहिंसा और शाकाहार में आवश्यक तथा अनिवार्य संबंध