13. ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने? - Page 137

122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

है। यह धारणा कि बौद्ध भिक्षु मांस स्पर्श नहीं करते रहे होंगे लेकिन यह एक भ्रांति है। वास्तविक बात यह है कि भिक्षु त्रिकोटी परिशुद्ध (तीन प्रकार से शुद्ध) मछली मांस ग्रहण कर सकता था। आगे चल कर यह पांच प्रकार का हो गया। चीनी यात्री ह्वेन सांग इससे परिचित था। उसने मांस के शुद्ध प्रकारों को सां-चिंग कहा है। थामस वाल्टर्स ने भिक्षुओं में इस प्रथा की उत्पत्ति की इस प्रकार व्याख्या की है उसकी कही कथा ख्1, के अनुसारःµ

फ्बुद्ध के समय में वैशाली में सिंह नाम का एक सम्पन्न सेनापति था, जिसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था। वह भिक्षु संघ का उदार समर्थक बन गया और भिक्षुओं को मांस भोजन की कमी न होने देता था। जब यह बाहर पता लगा कि भिक्षु इस प्रकार का तैयार किया हुआ भोजन ग्रहण कर लेते हैं तो तैर्थिकों ने उनकी निंदा करनी शुरू की जो संयमी साधक भिक्षु थे। जब उन्होंने यह सुना तो भगवान को सूचना दी।य् भगवान ने उन्हें संबोधन करके कहा भिक्षुओं! किसी ऐसे पशु का मांस नहीं खाना चाहिए जिसे तुमने देखा हो कि तुम्हारे लिए मारा गया है, जिसके बारे में तुमने सुना हो कि तुम्हारे लिए मारा गया है। किंतु उन्होंने भिक्षुओं को त्रिकोटि परिशुद्ध मत्स्य मांस की अनुज्ञा दे दी अर्थात् ऐसे पशु के मांस की जिसको न देखा हो कि हमारे लिए मारा गया हो, न सुना हो कि हमारे लिए मारा गया है और न किसी प्रकार का संदेह ही उत्पन्न हुआ हो कि हमारे लिए मारा गया है। पालि और सुफेन विनय पिटक के अनुसार बुद्ध और भिक्षु संघ को मध्याह्न भोजन दिया गया था। इस भोजन के लिए ही एक बैल की लाश की व्यवस्था की गई थी। निग्रन्थों ने भिक्षुओं की निंदा की। बुद्ध ने यह त्रिकोटि परिशुद्ध का नया नियम बनाया। अब से जो मांस भोजन भिक्षु कर सकते थे, वह त्रिकोटि परिशुद्ध अथवा त्रिकोटि परिशुद्ध मांस कहलाने लगा। इसे थोड़े में अदृष्ट अश्रुत अपरिशंकित अथवा चीनी अनुवाद के ढ़ग पर मेरे लिए मारा गया। ऐसा न देखा, न सुना, न संदेह हुआ कहा गया। तब दो और तरह का मांस भिक्षुओं के लिए नियमानुकूल ठहराया गया। जिस पशु की स्वाभाविक मृत्यु हो गई, तथा जो किसी शिकारी पक्षी अथवा अन्य किसी जंगली पशु द्वारा मारा गया हो। इस प्रकार पांच तरह का ऐसा मांस था जिसे कोई बौद्ध स्वतंत्रतापूर्वक उपयोग कर सकता था। तब यह अदृष्ट, अश्रुत और अपरिशंकित एक जाति हो गई और उसी में स्वाभाविक मृत्यु तथा पक्षीहंत को मिला देने से सां-चिह्न बन गया।

जब बौद्ध भिक्षु मांस खाते थे तो ब्राह्मणों को उसे छोड़ने की कोई आवश्यकता

  1. ह्वेन सांग (1904) खण्ड II, पृ. 55