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ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?

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नहीं थी। फिर ब्राह्मण मांसाहार छोड़ कर शाकाहारी क्यों बन गए। इसका कारण इतना ही था कि वे जनता की दृष्टि में बौद्ध भिक्षुओं के साथ समान तल पर नहीं

खड़ा होना चाहते थे।

यदि ब्राह्मण केवल यज्ञ करना और उसमें गो वध करना छोड़ देते तो इसका केवल एक सीमित परिणाम होता। अधिक से अधिक इससे ब्राह्मण और बौद्ध धर्म समान ध रातल पर खड़े हो जाते। यह बात तब होती यदि वे मांसाहार के संबंध में बौद्ध भिक्षुओं का अनुकरण करते। इससे ब्राह्मणों को अपने आपको बौद्धों से श्रेष्ठ सिद्ध करने का अवसर नहीं मिलता जो कि उनकी आकांक्षा थी। यज्ञों में गोवध का विरोध करके बौद्धों ने जनता के हृदय में आदर का स्थान प्राप्त कर लिया था। ब्राह्मण उन्हें इस स्थान से पद्च्युत करना चाहते थे। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए ब्राह्मणों को उस कुटिल नीति का अनुकरण करना पड़ा जिसमें परिणाम की ओर देखा ही नहीं जाता। यह अति को प्रचंड से पराजित करने की नीति है। वह यह युद्ध नीति है जिसका उपयोग वामपंथियों को हटाने के लिए सभी दक्षिणपंथी करते हैं। बौद्धों को हटाने का एक ही तरीका था कि उनसे एक कदम आगे जाकर शाकाहारी बन जाएं।

इस मत के समर्थन में एक और प्रमाण दिया जा सकता है कि ब्राह्मणों ने गो पूजा आरंभ की और गो मांसाहार त्याग कर शाकाहारी बन गए ऐसा बौद्धों को परास्त करने के लिए ही किया। यह वह स्थिति है जब गोवध एक महान पातक बन गया। यह सर्वविदित है कि अशोक ने भी गोवध को एक अपराध नहीं ठहराया था। बहुत से लोग उससे यह आशा रखते थे कि गोवध के लिए उसे आगे बढ़ कर कदम उठाना चाहिए था। प्रोफेसर विन्सर स्मिथ को यह बात आश्चर्यजनक लगती है लेकिन इसमें आश्चर्य की कुछ भी बात नहीं है।

बौद्ध धर्म सामान्य रूप से पशु बलि का विरोधी था। उसका गो के लिए ही कोई विशेष आग्रह नहीं था। इसलिए अशोक को इस बात की कोई खास आवश्यकता नहीं थी कि वह गो रक्षा के लिए कानून बनाए। बड़े आश्चर्य की बात है कि गो वध को महापातक घोषित करने वाले गुप्त नरेश हुए जो हिंदू धर्म के बड़े प्रचारक थे, उस हिंदू धर्म के जो यज्ञों के लिए गो वध की अनुज्ञा देता है। डॉक्टर भंडारकर ख्1, का कथन हैःµ

फ्हमारे पास इस बात का शिलालेख का अकाट्य प्रमाण है कि पांचवी शताब्दी के आरंभिक हिस्से में गोवध करना एक भयानक पाप माना जाता था उतना ही भयानक जितना किसी ब्राह्मण को मार देना। हमारे पास 645 ई. का एक ताम्र पत्र

  1. सभ आस्पेक्ट ऑफ एंसीएंट इण्डियन कल्चर (1940), पृ. 78-79