14. गोमांस भक्षण से छितरे बहिष्कृत व्यक्ति अछूत कैसे बने? - Page 140

अध्याय 14

गोमांसाहार से छितरे व्यक्ति अछूत कैसे बने?

जब ब्राह्मणों तथा अब्राह्मणों ने गोमांसाहार करना बंद कर दिया और छितरे आदमियों का गोमांसाहार जारी रहा, तो एक ऐसी स्थिति पैदा हो गई जो पुरानी स्थिति से भिन्न थी। अब फर्क यह पड़ गया कि पुरानी स्थिति में हर कोई गोमांसाहारी था। इस नई स्थिति में एक वर्ग ने गोमांस त्याग दिया था और दूसरा वर्ग खाता था। यह भेद खटकने वाला था। इसे हर कोई देख सकता था। इतना होने पर भी इस भेद का परिणाम समाज का इतना बड़ा विभेद नहीं हो सकता था जैसा इस छुआछूत में दिखाई देता है। यह एक सामाजिक भेद रह सकता था। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां एक समाज के भिन्न-भिन्न वर्ग भिन्न-भिन्न तरह का आहार ग्रहण करते हैं। एक की जो रुचि है दूसरे की अरुचि हो सकती है तो भी यह भेद दोनों में किसी प्रकार की दीवार नहीं खड़ी कर देता।

इसलिए कोई न कोई विशेष कारण होना चाहिए कि भारत में गोमांसाहार के विषय में स्थायी निवासी जातियों और खानाबदोशों के बीच में दीवार क्यों खड़ी हो गई? इसका क्या कारण हो सकता? उत्तर है कि यदि गोमांसाहार का धर्म से कोई संबंध न जुड़ता केवल व्यक्तिगत रुचि अरुचि का प्रश्न रहताµ मांस खाने वालों और न खाने वालों में एक दीवार नहीं खड़ी होती। दुर्भाग्य से मांसाहार एक सामान्य लौकिक बात न रह कर धर्म का प्रश्न बन गया। यह इसलिए हुआ कि ब्राह्मणों ने गो को पवित्र पशु बना दिया। इसी से गोमांसाहार पातक बन गया। ये खानाबदोश आदमी अधर्म करने वाले होने के कारण समाज से बहिष्कृत हो गए।

यह उत्तर उन लोगों के लिए बहुत स्पष्ट नहीं भी हो सकता जो समाज के जीवन में धर्म के स्थान को नहीं समझते। वे प्रश्न कर सकते हैं कि धर्म इस विभेद का कारण क्यों बना? यदि धर्म की निम्नलिखित दो बातों को ध्यान में रखा जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी।

सबसे पहले हम धर्म की परिभाषा ख्1, को लें। सभी धर्मों पर लागू होने वाली एक

  1. एलीमेंट्री फार्मस ऑफ, रिलीजियस लाइफ पृ. 47µदुरखीम