126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
व्यापक बात है। हर धर्म कुछ विश्वासों और आवरणों का एक स्वीकृत समूह होता है, (1) धार्मिक बातों से संबंध रखते हैं और जो (2) उन सब बातों को मानने वाले लोगों को एक जाति बना देते हैं। जरा दूसरी तरफ कहें, प्रत्येक धर्म में दो बातें रहती हैंµ एक यह बात कि धर्म को पवित्र चीजों से पृथक नहीं किया जा सकता। दूसरी बात यह है कि धर्म एक सामूहिक जीवन है जो समाज से पृथक नहीं हो सकता।
धर्म का जो पहला अंश है वह यह मान कर चलता है कि जितनी भी वस्तुएं हैंµचाहे भौतिक हो चाहे पवित्र हों, जो भी मनुष्य के विचारों का विषय बनती हैं वे दो स्पष्ट विभागों में विभक्त हो जाती हैं, जो धार्मिक तथा अधार्मिक अथवा सामान्य रूप से लौकिक कहलाती हैं।
इससे धर्म की परिभाषा हो जाती है। धर्म का कर्तव्य समझने के लिए उसके संबंध में निम्नलिखित पर ध्यान देना आवश्यक हैःµ
पहली बात जो ध्यान देने की है वह यह है कि जो मर्यादाएं पवित्र मान ली जाती हैं वे मर्यादाएं लौकिक वस्तुओं से केवल श्रेष्ठ और सम्मानित स्थान ही नहीं रखतीं, वे एकदम भिन्न हैं। पवित्र और लौकिक मर्यादाएं एक समान नहीं हैं। दोनों में एकदम विरोधाभास है। प्रोफेसर दुरखीम ख्1, का कथन हैःµ
फ्अच्छे और बुरे का परंपरागत विरोध इससे अधिक कुछ नहीं क्योंकि अच्छा और बुरा दोनों एक समाज के दो विपरीत तत्त्व हैं, ठीक वैसे ही जैसे स्वास्थ्य व बीमारी एक ही जीवनक्रम के दो भिन्न पहलू हैं किंतु मानव मस्तिष्क ने पवित्र और लौकिक की जो कल्पना की है वह सर्वत्र दो भिन्न-भिन्न समाजों की कल्पना हैµ एकदम दो भिन्न संसारों की जिनमें कुछ भी समान नहीं है।य्
जो अधिक जिज्ञासु हैं वे कदाचित यह जानना चाहेंगे कि संसार में मनुष्यों को किस चीज ने पवित्र और लौकिक को एक दूसरे के विपरीत मानने पर विवश किया। हमें इस विवाद में यहां नहीं पड़ना है, क्योंकि हमारे वर्तमान उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह किसी तरह प्रासंगिक नहीं है ख्2, ।
इसी प्रकरण में जो दूसरी बात ध्यान देने की है, वह यह है कि पवित्र वस्तुओं की संख्या निश्चित नहीं है। एक धर्म की पवित्र वस्तुओं और दूसरे धर्म की पवित्र वस्तुओं में अनन्त भिन्नता है। आत्मा और परमात्मा ही पवित्र वस्तुएं नहीं हैं। एक चट्टान, एक पशु, एक जलस्रोत, एक पत्थर का टुकड़ा, एक लकड़ी का टुकड़ा, एक घर-एक
ऐलीमेंट्री फार्मस ऑफ रिलीजयस लाइफ, पृ. 38, दुरखीम
जिज्ञासु, पृ. 37