136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
उक्त तालिका से स्पष्ट है कि जहां तक अन्त्यवासिन और अन्त्यज शब्दों के प्रयोग की बात है उसमें न तो कहीं कुछ निश्चयात्मक है और न कहीं किसी प्रकार का अर्थ साम्य ही है। उदाहरण के लिए चाण्डाल और श्वपाक दोनों ही मध्यमंगिरस और वेदव्यास के अनुसार अन्त्यवासिन और अन्त्यजों में भी गिने गए हैं। लेकिन जब मध्यमांगिरस की अत्रि के साथ तुलना की जाती है तो ये भिन्न श्रेणियों में विभक्त दिखाई देते हैं। यही बात अन्त्यज के लिए भी सत्य है उदाहरण के लिए वेदव्यास के अनुसार 1. चाण्डाल और 2. श्वपक अन्त्यज हैं किंतु अत्रि के अनुसार वे अन्त्यज नहीं हैं। फिर अत्रि के अनुसार बुरुद और कैवर्त अन्त्यज हैं किंतु वेदव्यास के अनुसार वे अन्त्यज नहीं हैं। फिर वेदव्यास के अनुसार (1) विराट, (2) दास, (3) भट्ट, (4) कोलिक, (5) पुष्कर अन्त्यज हैं।
किंतु अत्रि के अनुसार नहीं।
इसका सार इतना ही है न तो धर्म सूत्रों से ही हमें यह निश्चय करने में कुछ सहायता मिलती है कि अस्पृश्य कौन थे और ना ही स्मृतियों से। इसी प्रकार धर्म सूत्र और स्मृतियां इस बारे में भी हमारी कुछ सहायता नहीं करतीं कि जो वर्ग अत्न्यजवासिन, अन्त्यज अथवा बाह्य कहलाते थे क्या वे अस्पृश्य ही थे अथवा नहीं? क्या कोई दूसरा उपाय है जिससे यह निर्णय हो सके कि इनमें से कोई एक भी वर्ग अस्पृश्य अथवा अछूत की श्रेणी में आता है या नहीं? बेहतर तो यह होगा यदि हम इनमें से प्रत्येक वर्ग के बारे में जो भी जानकारी प्राप्त है, उसे एकत्र कर लें।
बाह्य को ही लें। वे कौन हैं? वे क्या हैं? क्या वे अछूत हैं? मनु ने उनका उल्लेख किया है। उनकी स्थिति समझने के लिए मनु की सामाजिक वर्गीकरण की योजना का उल्लेख करना आवश्यक है। मनु लोगों को अनेक वर्गों में विभक्त करता है। पहले तो वह ख्1, (1) वैदिकों (2) दस्युओं का वर्गीकरण करता है। इसके आगे वह वैदिकों को चार उप वर्गों में विभाजित करता हैःµ
(1) जो चातुर्वर्ण्य के भीतर हैं (2) जो चातुर्वर्ण्य के बाहर हैं
(3) ब्रात्य (4) पतित या जाति से बहिष्कृत हैं।
कोई आदमी चातुर्वर्ण्य के अंदर गिना जाए या नहीं, वह इस बात पर निर्भर करता था कि उसके माता-पिता का वर्ण क्या है? यदि वह समान वर्ण के माता-पिता की संतान है तो वह चातुर्वर्ण्य के अंदर गिना जाता था। यदि वह अलग-अलग वर्ण के माता-पिता की संतान हुआ जिसे मिश्रित विवाह का परिणाम कह सकते हैं अथवा जिसे
- मनुस्मृति, अध्याय-45