अशुचि और अछूत
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मनु वर्ण संकर कहता है तो वह चातुर्वर्ण्य से बाहर माना जाता था। जो चातुर्वर्ण्य के बाहर माने गए हैं मनु ने उसके फिर दो भेद किए हैं। (1) अनुलोम, (2) प्रतिलोम। अनुलोम ख्1, वे जिनके पिता ऊंचे वर्ण के किंतु माता नीच वर्ण की और प्रतिलोम उससे उल्टे अर्थात् जिनकी माता ऊंचे वर्ण की और पिता नीचे वर्ण के। यद्यपि चातुर्वर्ण्य के बाहर होने के कारण अनुलोम तथा प्रतिलोम दोनों समान ही थे तो भी मनु ने दोनों में भेद किया है। अनुलोमों को वह वर्ण बाह्य अथवा केवल बाहर कहता है और प्रतिलोम को हीन। फ्हीनय् बाह्य लोगों से निचले दर्जे के हैं लेकिन न बाह्य ही मनु की दृष्टि में अछूत हैं और न हीन ही।
अन्त्यों का एक वर्ण के रूप में मनुस्मृति के श्लोक 4.79 में उल्लेख किया गया है किंतु मनु उनकी गणना नहीं करते। मेधातिथि ने अपने भाष्य में बताया है कि अन्त्य का अर्थ म्लेच्छ है जैसे भेद इत्यादि। बुलहर ने अन्त्य का अनुवाद हीन जाति के आदमी के रूप में किया है।
इस प्रकार अन्त्यों के अछूत होने की किसी तरह पुष्टि नहीं होती। अधिक संभव यही है कि यह नाम उन लोगों को दिया गया था जो गांव के अंत में रहते थे। उनको नीच जाति के गिने जाने के कारण बृहदारण्यक उपनिषद की कथा में आता है, जिनका काणे ने उल्लेख किया है। ख्2, कथा इस प्रकार हैःµ
फ्देवताओं और असुरों में संग्राम हुआ। देवताओं ने सोचा कि वे उद्गीय उद्गीन्तक द्वारा असुरों पर विजयी हो सकते हैं। इसमें उद्धरण है कि इस देवता (प्राण) ने पाप जो इन देवताओं के लिए मृत्यु था, को इन देवों (वाव्Q आदि) के एक ओर फेंक कर देवताओं के अंत में पहुंचा दिया। इसलिए किसी को आर्यों की सीमा के बाहर नहीं जाना चाहिए न दिशाओं के अंत में (गृह निवासों के अंत में) उसे यह विचार करना चाहिए कि ऐसा करने से वह पाप मन अर्थात् काल के कराल गाल में जा सकता है।य्
अन्त्य शब्द का अर्थ इस उद्धरण में आने वाले फ्दिशाम अंतय् के अर्थ में आया है। यदि दिशाम अंत का अर्थ गांव की सीमा के सिरे पर लिया जा सकता है और उसे खींचतान कर निकाला हुआ अर्थ न समझा जाए तो अन्त्य शब्द के मूल अर्थ की कुछ व्याख्या हमारे हाथ लग जाती है। इससे यह अर्थ नहीं निकलता कि अन्त्य लोग अछूत हैं। इससे इतना ही अर्थ निकलता है कि वे गांव की सीमा पर रहते थे।
मनु स्मृति, अध्याय-45
काणे, हिस्ट्री आफ धर्म सूत्र, खण्ड 2, भाग 1, पृष्ठ 167