138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
जहां तक अन्त्यजों की बात है उनके बारे में जो कुछ हम जानते है, वह उनके अछूत होने की बात का खंडन करने के लिए पर्याप्त है। इन कुछ बातों की ओर ध्यान दिया जा सकता है। ख्1,
महाभारत के शांति पर्व (109.9) में अन्त्यजों के सैनिक होने का उल्लेख है। सरस्वती विलास के अनुसार पितामह ने रजकों की सात जातियों की बात कही है, जो प्रकृति के रूप में अन्त्यजों में गिने जाते थे। प्रकृति का अर्थ धोबी आदि व्यावसायिक श्रेणियां हैं यह बात शक सम्वत् 622 के भिल्लक द्वितीय के संगमनेर (ताम्रपत्र) से स्पष्ट हो जाती है। इस ताम्रपत्र में 18 प्रकृतियों को दान में दिए गए एक गांव का उल्लेख है। वीरमित्रोदय का कहना है कि श्रेणी का अर्थ रजक आदि अठारह जातियां हैं जो सामूहिक तौर पर अंत्यज कहलाती हैं। इन बातों के रहते हुए यह कैसे कहा जा सकता है कि अंत्यज लोग अछूत माने जाते थे।
अब अन्त्यवासिनों को लें। वे कौन थे। क्या वे अछूत थे? अन्त्यवासिन शब्द का दो भिन्न अर्थों में प्रयोग हुआ है। इसका एक अर्थ है वह ब्रह्मचारी जो गुरु के पास उसके घर रहता है। ब्रह्मचारी के लिए अन्त्यवासिन ख्2, शब्द आया है। शायद अंत में भोजन करने वाला होने से अन्त्यवासिन कहलाता हो। जो भी हो, यह निर्विवाद है कि इस संबंध में इस शब्द का अर्थ अछूत नहीं हो सकता तो हो ही कैसे सकता है जब केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही ब्रह्मचारी बन सकते थे? दूसरे अर्थ में वह एक लोक समूह का द्योतक है किंतु इसमें भी इस बात में संदेह है कि यह शब्द अछूत का पर्याय था।
वशिष्ठ धर्म सूत्र (18.3) के अनुसार वे शूद्र पिता और वैश्य माता की संतान हैं। किंतु मनु 15.39 के मत के अनुसार वे चाण्डाल पिता और निषाद माता की संतान हैं। उनके वर्ग के संबंध में मिताक्षरा का कहना है कि अन्त्यवासिन अन्त्यजों का ही एक उपवर्ग है। इसलिए अन्त्यजों के बारे में जो बात सत्य है, वह अन्त्यवासिन के बारे में भी सत्य समझी जा सकती है।
III
यदि विषयांतर कर अपने प्राचीन साहित्य में अन्त्यवासिन, अन्त्य तथा अन्त्यज आदि की सामाजिक अवस्था के बारे में प्राप्त जानकारी का विवरण लें तो स्पष्ट है कि हमें यह कहने में संकोच है कि अछूत शब्द के आधुनिक अर्थ में वे अछूत थे,
काणे, हिस्ट्री आफ धर्म सूत्र, खण्ड 2, भाग 1, पृष्ठ 70
अमर कोश 2 ब्रह्म वर्ग, श्लोक 4