अशुचि और अछूत
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लेकिन तो भी ऐसे लोगों की भरपाई के लिए जिन्हें अभी संदेह बाकी हो, एक दूसरे दृष्टिकोण की भी समीक्षा की जा सकती है। यह मान कर कि उन्हें अस्पृश्य कहा गया है, हम यह पता लगाने का प्रयास करें कि धर्म सूत्रों के समय में अस्पृश्य शब्द का क्या लाक्षणिक अर्थ था।
हम उद्देश्य की पूर्ति के लिए धर्म शास्त्रों के बनाए हुए प्रायश्चित के नियमों को लें। इनका अध्ययन करने से हम यह देख सकेंगे कि क्या धर्म सूत्रों के समय में भी अस्पृश्य शब्द से भी वही अर्थ प्रकट होता है जो आज है।
इस उदाहरण के लिए अस्पृश्य कहलाने वाली एक जाति चाण्डाल को लें। पहले तो यह बात ध्यान में रखने की है कि चाण्डाल शब्द से किसी जाति विशेष का भान नहीं होता। यह एक दूसरे से भिन्न कई तरह के लोगों के लिए एक शब्द है। शास्त्रों में कुल मिलाकर पांच तरह के चाण्डालों का वर्णन है। वे हैंःµ
(1) शूद्र पिता और ब्राह्मण ख्1, माता की संतान
(2) कुंवारी कन्या ख्2, की संतान
(3) सगोत्र स्त्री ख्3, की संतान
(4) संन्यासी होकर पुनः गृहस्थ होने वाले की संतान ख्4,
(5) नाई पिता और ब्राह्मण माता ख्5, की संतान।
यह कहना कठिन है कि किस चाण्डाल का शुद्ध होना आवश्यक है। हम यह मान लेते हैं कि सभी चाण्डालों का शुद्ध होना आवश्यक कहते हैं। शास्त्रों ने शुद्धि के क्या नियम ठहराए हैंःµ
फ्जाति बहिष्कृत, एक चाण्डाल, सूतक के कारण अपवित्र स्त्री, मासिक धर्म वाली स्त्री, मुर्दा तथा उनको स्पर्श करने वाले लोगों का यदि स्पर्श हो जाए तो सचैल (वस्त्रों सहित) स्नान से पवित्र हो सकेगा।य्
फ्यह सतंभ, चिंता, श्मशान भूमि, रजस्वला स्त्री, अथवा सद्यप्रसूता स्त्री, अपवित्र आदमी अथवा चाण्डाल को स्पर्श करने वाले को पानी में डुबकी लगा कर स्नान करना होगा।य्
धर्मसूत्रों, स्मृतियों तथा मनुस्मृति के अनुसार।
वेद व्यास स्मृति (1.910) के अनुसार।
वेद व्यास स्मृति (1.910) के अनुसार।
परासर माधव्य में उद्धृत फ्यमय् के अनुसार।
अनुशासन पर्व (29-17) जिसे मातंग भी कहा जाता है।