140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
बौधयन वशिष्ठ से सहमत हैं, क्योंकि उसके धर्म सूत्र (प्रश्न-1, अध्याय 5,
खंड-6, श्लोक-5) का कहना हैःµ
अपवित्र स्थान पर लगा हुआ वृक्ष, चिता, यज्ञ स्तंभ, चाण्डाल तथा वेद बेचने वाले को यदि कोई ब्राह्मण स्पर्श करेगा तो उसे सचैल स्नान करना होगा।य्
मनु स्मृति के नियम इस प्रकार हैंःµ
5.85 जब ब्राह्मण किसी चाण्डाल, किसी रजस्वला स्त्री, किसी पतित, किसी प्रसूता, किसी शव अथवा जिसने शव को स्पर्श किया हो, ऐसे किसी का स्पर्श करता है तो स्नान करने से शुद्ध होता है।
5.131 कुत्तों द्वारा मारे गए (पशु) का मांस, किसी अन्य मांसाहारी पशु द्वारा मारे गए प्राणी का मांस अथवा चाण्डाल द्वारा मारे गए प्राणी का मांस पवित्र होता है।
5.143 किसी वस्तु को किसी भी ढंग से ले जाता हुआ कोई व्यक्ति यदि किसी अपवित्र व्यक्ति या वस्तु से छू जाएगा तो उस चीज को बिना रखे ही वह आचमन करने से पवित्र हो जाएगा।
धर्म सूत्रों तथा मनुस्मृति से उद्धृत इन उद्धरणों से निम्नलिखित बातें स्पष्ट हो जाती हैंःµ
चाण्डाल के स्पर्श से केवल ब्राह्मण ही अशुद्ध होता था।
संभवतः संस्कार विशेष के ही अवसर पर शुद्धि-अशुद्धि का ख्याल किया जाता था।
IV
यदि ये निष्कर्ष ठीक हैं तो यह अशुद्धि का ही मामला है जो अस्पृश्यता से बिल्कुल भिन्न है। अपवित्र और अछूत में भिन्नता बिल्कुल स्पष्ट हो। अछूत सभी को अपवित्र करता है, किन्तु अशुद्ध केवल ब्राह्मण को अपवित्र करता है। अशुद्ध का स्पर्श केवल संस्कारों के अवसर पर ही अपवित्रता का कारण बनता है, किन्तु अछूत का स्पर्श सदैव कारण बनता है।
एक और तर्क है जिसका उल्लेख अभी तक नहीं किया गया है। इससे यह मत सर्वथा निरर्थक सिद्ध हो जाता है कि धर्म सूत्रों में जिन जातियों के नाम आए हैं वे अछूत थीं। यह तर्क अध्याय 2 में आर्डर-इन-कौंसिल की जातियों की जो सूची दी गई है और इस अध्याय में स्मृतियों के आधार पर बनाई गई सूची की तुलना करने से उत्पन्न होता है। इस तुलना से क्या प्रकट होता है?