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अशुचि और अछूत

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  1. स्मृतियों में दी गई जातियों की अधिक से अधिक संख्या केवल 12 है जबकि आर्डर-इन-कौंसिल में इन जातियों की संख्या 429 है।

  2. ऐसी जातियां हैं जिनके नाम आर्डर-इन-कौंसिल में तो हैं किंतु स्मृतियों ख्1, में नहीं हैं। कुल 429 में से 427 जातियां ऐसी हैं जिनके नाम स्मृतियों में हैं ही नहीं।

  3. ऐसी जातियां हैं जिनके नाम स्मृतियों में हैं, किन्तु आर्डर-इन-कौंसिल की सूची में नहीं हैं।

  4. ऐसी केवल एक जाति है जिसके नाम दोनों में हैं। वह जाति है चमार ख्2,

जो यह नहीं मानते कि अपवित्र और अछूत अलग-अलग हैं वे उक्त बातों से अपरिचित प्रतीत होते हैं। लेकिन उन्हें यह बात स्वीकार करनी ही पड़ेगी। ये बातें इतनी विशेष और इतनी प्रभावोत्पादक हैं कि हमें इस बात को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि अपवित्र और अछूत भिन्न-भिन्न हैं। पहली बात को लें। इससे एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है।

यदि दोनों सूचियों में एक ही वर्ग के लोगों का उल्लेख हो तो इन दोनों में यह भेद और इतना अधिक भेद क्यों है? यह कैसे है कि शास्त्रों में जिन जातियों का नाम आया है वे आर्डर-इन-कौंसिल में हैं ही नहीं? दूसरी ओर आर्डर-इन-कौंसिल में जिन जातियों का नाम आया है वे शास्त्रों की सूची में हैं ही नहीं? यह ऐसी कठिनाई है जिसे हल करना होगा।

यदि हम यह मान लें कि इससे एक ही वर्ग के लोगों का तात्पर्य है तो स्पष्ट ही है कि आरंभ में जो छुआछूत केवल बारह जातियों तक सीमित थी वह 429 जातियों में फैल गई। इस अस्पृश्यता के जंजाल के विस्तार का क्या कारण है? यदि ये 429 जातियां उसी वर्ग की हैं जिस वर्ग की बारह जातियों का शास्त्रों में उल्लेख है तो किसी भी शास्त्र में इन चार सौ उन्तीस जातियों का नाम क्यों नहीं है? यह हो ही नहीं सकता कि जिस समय शास्त्र लिखे गए उस समय इन चार सौ उन्तीस जातियों में से कोई एक भी जाति विद्यमान नहीं थी। यदि सब नहीं थीं तो कुछ तो अवश्य रही होंगी। तब जो थीं उनका भी नाम क्यों नहीं लिखा मिलता?

  1. कौंसिल आदेश में उल्लिखित 429 जातियों में से केवल 3 का स्मृतियों में वर्णन है।
  2. दोनों सूचियों में नट और रजक का भी उल्लेख है किंतु कौंसिल आदेश के अनुसार वे देश के कुछ भागों में ही अस्पृश्य हैं। चमार पूरे देश में अछूत हैं।